पतझड़ के पत्तों सा टूटा ,
गिरा कहीं कुछ खुद मुझमें।
अपनी कुछ उम्मीदें टूटी,
संग-संग टूटे कुछ सपने।
तिनका-तिनका बना घरौंदा,
उजड़ा बिखरा राहों में।
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
कुछ दिन-कुछ पल या कुछ बातें,
थी चाह मेरी कोई सुनता।
पर दूजे की परवाह किसे?
है कौन यहां कुछ भी गुनता?
बस मतलब की यहां यारी है,
और मतलब की दुनियादारी।
सब मतलब पर ही याद करें,
सब मतलब पर परवाह करें।
कितने घाव लगे इस दिल पर,
देकर कोई गिनता है क्या?
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
हर बार सोचकर कोशिश की,
हर बार उम्मीदें करता हूं।
है पता मुझे है बेमतलब,
फिर भी तकलीफे चुनता हूं।
जिन्हें खुद से ही लेना देना,
उनको रिश्तों की कहां पड़ी?
बस अपनी झोली भरने तक,
रिश्तों का साथ निभाते हैं।
किसकोअपने ज़ख्म दिखाएं ?
मरहम भी कोई रखता है क्या?
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?



Great brother
LikeLiked by 1 person
Thank you very much
LikeLike