व्यक्ति का सरल व शान्त होना भी एक अपराध ही है।सच ही कहा गया है,आप हर किसी के साथ अच्छे नहीं हो सकते।कभी-कभी प्रतिरोध करना भी आवश्यक होता है।क्योंकि विद्युत धारा का प्रवाह भी उसी परिपथ में अधिक सरलता से होता है,जिसका प्रतिरोध अन्य परिपथों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होता हैं। इसलिए खुद को इतना भी सस्ता न बनाएं कि कोई भी आए और खेल जाए।
It is also a crime for a person to be simple and calm. It is true that you cannot be nice with everyone. Sometimes resistance is also necessary. Because the flow of electric current also happens more easily in the same circuit, whose resistance is relatively less as compared to other circuits. So don’t make yourself so cheap that just anyone can come and play.
किसी को माफ़ करना आसान है लेकिन, खुद को मन से स्वीकारना बहुत मुश्किल।
हमारे आस-पास कुछ लोग होते हैं ।कुछ अपने,कुछ पराए,कुछ दोस्त,तो कुछ दुश्मन; लेकिन मानो अगर किसी से कोई गलती हो जाए। जिससे आपका जीवन बुरी तरह प्रभावित होता हो,तो आप क्या करेंगे? उससे बदला लेंगे या उसे सजा देंगे। कुछ लोग ऐसा ही करते हैं ,पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो दूसरों को गलतियों पर उन्हें माफ करने का जिगर रखते हैं। पर दूसरों को माफ़ करना हिम्मत का ही सही पर उतना मुश्किल काम नहीं है, जितना खुद की गलतियों पर खुद को ही दिल से माफ़ करना और खुद को स्वीकार करना।”खुद को माफ़ करना “यह एक बहुत बड़ी बात होती है। ये जितना सुनने में और कहने में आसान लगता है, उससे कहीं ज्यादा कठिन कार्य है। अब आप सोचेंगे कि ख़ुद को माफ़ करना ये तो बहुत ही आसन काम है,लेकिन मै कहूंगा “जी बिल्कुल नहीं”।क्या आपने; अपने जीवन में कुछ ऐसा काम किया है, कोई ऐसी गलती; जिसने आपकी ज़िंदगी का रुख ही बदल कर रख दिया हो।कुछ ऐसा जिसे याद करके आपको पछतावा होता है कि काश मुझसे ये गलती न हुई होती।सभी ने अपने जीवन में कोई न कोई ऐसा काम ज़रूर किया होता है।कोई ऐसी गलती या कोई चूक की होती है ,जिसका उसको जीवन भर पछतावा होता रहता है।अब ख़ुद से पूछिए आपको उस गलती की याद बार बार आ रही है या नहीं।अगर जवाब “नहीं”है तो मुबारक हो आप खुद को माफ़ कर चुके हैं और अगर आपका जवाब “हां” में है। आपको अपनी की हुई गलती बार बार याद आ रही है तो आपको खुद को दिल से माफ़ करने की जरूरत है पर बात यहां ही नहीं खत्म होती।एक बात और है जो मैं आपसे कहना चाहता हूं।आज समाज एक नई तरह की समस्या से जूझ रहा है, और वो है खुद की कमियों को स्वीकार न करना या खुद को खुद की कमियों के साथ स्वीकार न करना। अगर आप अपनी कमियों और गलतियों को दिल से नहीं स्वीकारते हैं तो आप उनसे सीख लेकर कभी भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। कभी-कभी यह समस्या व्यक्तिगत अहंकार से जुड़ी होती है।लेकिन हम यहां उसकी बात नहीं कर रहे।हम बात कर रहे हैं।खुद को खुद की ही कामियों के साथ स्वीकारने की ,जो की अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है।यह कमियां शारीरिक, मानसिक या व्यवहारिक किसी भी प्रकार ही हो सकती हैं।हो सकता है आपके अन्दर कोई जन्मजात दोष जैसे-तोतलापन,किसी भी प्रकार ही विकलांगता या फ़िर आपका व्यवहार।हो सकता है आप अन्य लोगों का जल्द ही यकीन कर लेते हैं इसलिए आप जल्दी धोखा खा जाते है।आपके व्यवहार से दूसरों को तो लाभ होता है पर आप हमेशा लोगों की चालाकी और षड्यंत्रों का शिकार हो जाते हैं। लेकिन ये जरूरी नहीं कि आपके साथ ये समस्या जन्मजात ही हो या वास्तव में यह कोई समस्या भी हो।यह आपके मानने पर निर्भर है।अगर मानवीय व्यवहार ही बात करें तो अगर कोई व्यक्ति सीधा है तो यह कोई दोष नहीं है। अपने इस व्यवहार के कारण अगर कोई परेशान है तो उसे बस यह समझने की आवश्यकता है कि हर व्यक्ति के साथ आप अच्छे नहीं हो सकते। यदि आप मे कोई शारीरिक या मानसिक दोष हैं तो इसके लिए रोने या पछताने की आवश्यकता नहीं है।मेरी बातें कड़वी लग सकती हैं, पर आप खुद सोचिए कि किसी भी कमी या दोष या किसी गलती पर यूं ही जीवन रोने और पछताने से कुछ होता है भला । इस चार दिनों की जीवन यात्रा को यदि रोते, पछताते बितायेंगे तो आपने जीवन कब जिएंगे?इसलिए यदि जीवन में आपको आगे हंसते-मुस्कुराते बढ़ना है तो खुद को खुद की कमियों के साथ स्वीकारिए और अपनी गलतियों के लिए खुद को माफ़ करते हुए आगे बढ़ते रहिए, नहीं तो सारा जीवन बस रोने में ही चला जाएगा और आप अपने जीवन में जो कुछ भी पाना चाहते हैं;आप उसे मिलने से पहले ही खो देंगे। इसलिए खुद और खुद के जीवन का सम्मान करें उसका अपमान नहीं क्योंकि ईश्वर ने जो कुछ भी इस धरती पर सृजन करके भेजा है, वो सर्वोत्तम है और यदि आपको कुछ कमी लग रही हो तो एक सत्य जान लीजिए कि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं जिसमें बेहतर बनने की गुंजाइश न हो।
ज़िंदगी भर एक बात हमेशा याद रखना, जो तुम्हारी बुराई करे उसे हमेशा साथ रखना।
Always remember one thing throughout your life, always keep the one who criticise you with you.
हर इन्सान को अपनी तारीफ़ अच्छी लगती है। दुनियां में ऐसा कोई भी नहीं जिसे तारीफ़ से तकलीफ हो भले ही वो तारीफ झूठी ही क्यों न हो। मगर जब कोई आपकी बुराई करता है और आप में कमियां निकालता है।तब आपको बुरा लगता है और आप अपना मन मसोस कर रह जाते हैं। अगर आप उसे करारा जवाब दे सकने लायक हैं, तो आप वैसा ही करते हैं और अगर नहीं तो आप उसे मन ही मन गालियां देते हैं। पर क्या आपको पता है कि आपके जीवन में कुछ ऐसे ही लोग होने ही चाहिएं जो आपको;आपकी कमियां दिखा सकें।बात बात पर आपमें नुक्स निकालने वाला हर इन्सान आपका दुश्मन ही नहीं आपका दोस्त भी हो सकता है। आपको आईना दिखाने वाला शख्स बस आपको;आपकी सही तस्वीर दिखाए, फ़र्क नहीं पड़ता कि वो आपका दोस्त है या दुश्मन। कभी कभी हम अपनी कमियों को पहचान नहीं पाते और कभी कभी तो हमें एहसास ही नहीं होता कि हममें कोई कमी भी है। ऐसे शख्स से आपको ये फ़ायदा होता कि आपको ;अपनी कमियों को ढूंढना नहीं पड़ेगा। बल्कि कोई है, जो आपके लिए यह काम खुद कर रहा है। इससे आपकी शक्ति भी बचेगी, जिसे आप ख़ुद को तराशने में लगा सकते हैं। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं,जो आपमें यूं ही नुक्स निकालते रहते हैं।उनकी बातों का कोई सिर-पैर नहीं होता। पर उनकी बातों को भी कभी नज़रंदाज़ न करें। उनकी बातें अर्थपूर्ण भी हो सकती हैं। यदि उनकी बातों में थोड़ी भी सच्चाई है तो आपको ख़ुद को निखारने का एक और मौका मिल जायेगा और अगर नहीं है तो आपका उत्साह बढ़ जायेगा,क्योंकि लोग बस उसी का रास्ता काटते हैं ,जो तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहा होता है। इसलिए ऐसे लोगों को वरदान मानिए जो आपको आईना दिखाकर, आपको संवारने में मदद कर सकते हैं और साथ ही साथ आपको बेहतर से बेहतरीन बन सकते हैं।
Every person likes to be praised. There is no one in the world who is hurt by praise, even if the praise is false. But when someone speaks ill of you and finds faults in you, then you feel bad and feel sad. If you are capable of giving him a befitting reply, you do so and if not, you abuse him in your mind. But do you know that there should be some people in your life who can show you your shortcomings. The person who finds faults in you in every conversation can be not only your enemy but also your friend. The person who shows you the mirror just shows you the true picture of you, it does not matter whether he is your friend or your enemy. Sometimes we are unable to recognize our shortcomings and sometimes we do not even feel that we have any shortcomings. You would benefit from such a person that you would not have to look for your shortcomings. Rather, there is someone who is doing this work for you himself. This will also save your energy, which you can use in carving yourself. But there are some people who keep finding faults in you. Their words have no basis. But never ignore their words either. His words may also be meaningful. If there is even a little truth in what they say then you will get another chance to improve yourself and if not then your enthusiasm will increase, because people only cross the path of those who are moving forward on the path of progress. Therefore, consider it a blessing to have such people who can show you a mirror and help you in grooming you and at the same time can help you become the best of the best.
हमारी एक बुरी आदत है।जब भी हमारे साथ कुछ गलत होता है,तो हम उसका दोष किसी दुसरे पर मढ़ देते हैं। जबकि हमें यह समझना जरूरी है कि हमारे साथ जो कुछ भी गलत हो रहा है,उसके जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। अगर कोई हमारा फ़ायदा उठाने की कोशिश करता है, तो इसके मतलब ये नहीं कि वो ही गलत है। अगर हम किसी को मौका ही न दे,तो भला हमारा कोई फायदा कैसे उठा सकता है? अगर हमें कोई धोखा देता है तो इसका मतलब बस ये है कि हम सजग नहीं थे। इसलिए अपने साथ जो भी कुछ गलत हो रहा है,उसके लिए किसी दुसरे को दोषी न ठहराना बन्द करें और अपने द्वारा की गई लापरवाही और गलतियों की जिम्मेदारी स्वयं लें।
मुफ़्त में मिले ज्ञान को लोग उपदेश समझते हैं और उपदेश अक्सर भुला दिए जाते है।लेकिन वही ज्ञान जब पैसों से खरीदा जाए तो इन्सान उसे ज़िंदगी भर याद रखने की कोशिश करता है।
तृण तृण में जिसके प्रेम भरा, वो भारतवर्ष हमारा है। इसकी गोदी में जन्म लिया, हमको प्राणों से प्यारा है। यहां भांति-भांति के लोग बसे, यहां भिन्न-भिन्न भाषाएं हैं। बाइबिल-कुरान-गुरुग्रंथ-गीता, कितने ही वेद-ऋचाएं हैं। यहां पत्थर भी पूजे जाते , गौ को भी माता कहते हैं। सूरज-चंदा-नभ-वारि-अनल, सबको भगवान समझते हैं। यहां श्रद्धा इतनी प्रबल-अटल, कण-कण में प्रभु का वास यहां, जल छिड़क शुद्धि करते सबकी, इतना गहरा विश्वास यहां। यहां जाति धर्म मत भिन्न भले, कितनी ही भिन्न विधाएं हैं। पर सबके अन्दर प्रेम भरा, अपनेपन की आशाएं हैं। संतान को जब भी कष्ट कोई, मां को होता आभास यहां। इक धागे से बंध जाते हैं, ऐसे रिश्तों का वास यहां। है भाव भरा सबके उर में, भावों की शक्ति प्रबल यहां। तभी धरती मां के लाल खड़े, सीमा पर होकर सबल यहां। जो जन्मा यहां विशेष वही, हूं धन्य यहां जो जन्म लिया। यहां जन्मा यही पे प्राण तजूं , मैने मन में संकल्प लिया। सब बोलो जय हो जय हो जय हो, जय जय जय जय जय भारत। बन विश्वगुरू जग में चमके, सूरज सा उजियारा भारत।
Whose love is filled with every straw, That Bharat is ours. Born in its lap, We love it more than our lives. Different types of people settled here, There are different languages here. Bible-Quran-Gurugranth-Gita, There are so many Vedas and hymns. Even stones are worshiped here, Cow is also called mother. Sun-moon-sky-water-Fire Everyone is considered God. The faith here is so strong and steadfast, God resides here in every particle, Sprinkling water to purify everyone, Such deep faith here. Even if caste and religion differ here, There are so many different genres. But everyone is filled with love, There are hopes of belonging. Whenever the child faces any problem, Mother feels here. are tied together by a thread, Such relationships reside here. Everyone’s heart is filled with emotion, The power of emotions is strong here. Then the sons of Mother Earth stood, Strong here after crossing the border. The one who is born here is special, I am blessed to be born here. Born here, I will spend my life here, I took a resolution in my mind. Everyone say Jai Ho Jai Ho Jai Ho, Jai Jai Jai Jai Jai Bharat. Become a world leader and shine in the world, Bharat is as bright as the sun.
देश किसी व्यक्ति से नहीं बनता बल्कि वहां के लोगों से बनता है। अगर भारत को विश्वगुरु बनाना है तो हम सभी को मिलकर एक साथ काम करना होगा। लेकिन याद रहे इस यात्रा के दौरान या पूर्ण होने के बाद कोई सन्तोष या आराम नहीं,क्योंकि एक लीडर कभी भी थककर या सन्तुष्ट होकर नहीं आराम नहीं करता।
A country is not made by any individual but by its people. If India has to be made a world leader then we all will have to work together. But remember there is no satisfaction or rest during this journey or after its completion, because a leader never rests when tired or satisfied.
बुरे वक्त में ही होती है बस अपनों की पहचान, सच में भला ख़बर है किसे,अपना कौन है?
It is only in bad times that one gets to know one’s own people,who really knows who is one’s own?
जब सब कुछ ठीक या बेहतर चल रहा हो उस वक्त तो सभी साथ देते है ,लेकिन जब भी आप समस्या में हों, खासकर तब जब आपकी माली हालत खस्ता हो।तो ऐसी स्थिति में आप अकेले होते हैं।बस साथ होते हैं तो कुछ सच्चे दोस्त और आपका परिवार और कभी कभी तो वो भी नहीं। कड़वी सच्चाई है मुसीबत के मारे कोई भी सहारा नहीं देता। लेकिन उगते सूरज को सब सलाम करते हैं।जब आपका बुरा समय चल रहा हो तो आपको मालूम पड़ता है कि आपने अपने जीवन में क्या कमाया है । मतलब ऐसा कोई है जो मुसीबत में आपके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ा है या नहीं।अगर आपके पास कोई ऐसा है तो वही आपके जीवन की सच्ची कमाई है। लेकिन अगर नहीं तो या तो आपके सम्बंध अपनों के साथ अच्छे नहीं थे या फिर आपने लोगों को पहचानने में गलती कर दी है।सच ही कहा गया है बुरा वक्त एक आईना है जो सबकी सच्चाई को सामने दिखाता है। इसलिए इससे नफ़रत न करें और परेशान न हों, क्योंकि ये आपको मजबूत बनाएगा और अपने जीवन में सही लोगों को चुनना सिखाएगा।
When everything is going well or better, then everyone supports you, but whenever you are in trouble, especially when your financial condition is bad, then in such a situation you are alone. Friends and your family and sometimes not even that. The bitter truth is that no one provides support in times of trouble. But everyone salutes the rising sun. When you are going through bad times, you realize what you have earned in your life. Meaning whether there is someone who stands shoulder to shoulder with you in trouble or not. If you have someone like that then he is the true income of your life. But if not, then either your relations were not good with your loved ones or you have made a mistake in recognizing people. It is rightly said that bad times are a mirror which shows everyone’s truth. So don’t hate it and don’t be upset because it will make you stronger and teach you to choose the right people in your life.
जब-जब तूने पंख उठाए, मन ने कितने खेल रचाए। कोशिश तेरी है बिन मतलब, पथ पर पग-पग ये भरमाए। हुए पांव घायल जब तेरे, फिर उठने से डरता क्यूं है? हार गया तो जीतेगा भी, मन की इतनी सुनता क्यूं है? मन की इतनी सुनता क्यूं है? हर बार जो तूने ज़िद ठानी, चाहा जो सागर को तरना। मन ने फिर प्रश्न खड़े करके, चाहा बाधाओं को रखना। बस अनसुलझे से धागे हैं ये, मन में जाले बुनता क्यूं है? हार गया तो जीतेगा भी, मन की इतनी सुनता क्यूं है? मन की इतनी सुनता क्यूं है? कुछ भी सोचे कुछ भी चाहे, मन ने कब मुश्किल राह चुनी। भय खाता ये बदलावों से, इसको तेरी परवाह नहीं। हर बार है हारा जीवन में, पछताया इसकी सुन-सुनकर। कह दे अब तक क्या मिल पाया? तुझको जीवन में डर-डरकर। जीवन तो संग्राम है ठहरा, लड़ने से फिर डरता क्यूं है? हार गया तो जीतेगा भी, मन की इतनी सुनता क्यूं है? मन की इतनी सुनता क्यूं है? बढ़ चला सफ़र की राह में जो, हिम्मत की मुट्ठी को बांधे। बाधाओं की परवाह न कर, चलता चल तूं डर के आगे। मंज़िल भी बाहें फैलाकर, फ़िर तुझको गले लगाएगी। राहों में बिछी जो शूल तेरे, फूलों का पथ बन जायेगी। बाधाओं से ही निखरेगी, तेरे व्यक्तिव की हर क्षमता। तूं छोड़ दे डर अब कदम बढ़ा, पूरी होगी फिर हर मंशा। आशा है,सपने भी होंगे, पूरा करने से डरता क्यूं है? हार गया तो जीतेगा भी, मन की इतनी सुनता क्यूं है? मन की इतनी सुनता क्यूं है? लक्ष्य का पथ आसान कहां, कहीं कंकड़ है कहीं कीचड़ है। बिन कष्ट उठाए जीवन में, पाना कुछ भी अति दुष्कर है। बिन गूंथे माटी ना चाक चढ़े, बिन स्वर्ण तपे कुन्दन कैसा? बिन बाधाओं विपदाओं के बिन जीत-हार जीवन कैसा? हर हार तुझे सिखलाएगी, असफलता से डरता क्यूं है? हार गया तो जीतेगा भी, मन की इतनी सुनता क्यूं है? मन की इतनी सुनता क्यूं है?
जब भी हम कुछ करना चाहते हैं तो हमारा मन हमें रोकता है। ये हमें डराता है,भ्रमित करता है और हमारे हृदय में शंका का बीज बोता है जिससे हम अपने लक्ष्य पथ से विमुख हो जाएं।एक बात समझ लिजिए कि हमारा मन हमें इन्द्रिय सुखों की ओर भटकता है जैसे-हद से ज्यादा सोना,आराम करना, आलस करना, नए बदलावों से इंकार करना आदि। ये हमें हर उस काम में लगाने की कोशिश करता है जिससे हमारा भला दूर दूर तक न हो सके।इसलिए हमें अपने मन की उन बातों को मानने से इनकार कर देना चाहिए जो हमारे विकास के मार्ग में बाधक हैं।
Whenever we want to do something our mind stops us. It scares us, confuses us and sows the seeds of doubt in our heart due to which we deviate from our target path. Understand one thing that our mind wanders towards physical pleasures like excessive sleeping, resting etc. , being lazy, refusing new changes etc. It tries to involve us in every work which cannot do us any good. Therefore, we should refuse to accept those things in our mind which are obstacles in the path of our development.
कितना भी खुद से भाग लो लेकिन। हकीकत से छुपकर कहां जाओगे?
No matter how much you run away, Where will you go to hide from reality?
हम अपनी वास्तविकता से भले ही कितना भी किनारा क्यूं न कर लें। जो सच्चाई है वो कभी बदल नहीं सकती। चाहे यह बात हमारी पहचान से सम्बंध रखती हो या फिर हमारी तत्कालीन परिथितियों से। ज्यादातर लोग समस्याएं आने पर दूसरों को और भगवान को दोष देते हैं या अपने बुरे वक्त का रोना रोते हैं और सोचते हैं कि कोई आए और हम पर तरस खाए।वो देखे की हम ज़िंदगी के किस दौर से गुजर रहे हैं। इससे बात नहीं बनी तो हम खुद को नशे के अंधे कुएं में झोंक देते है,बस चन्द पल के लिए खुद को भरमाने के लिए कि अब जिंदगी में कोई गम नहीं है। इसके बाद अगली सुबह एक नया रोना या फिर नशे की लत।बस यही ज़िंदगी बन कर रह गई है। अपने हालातों पर रोना भी एक तरह का नशा है, जिससे हम अपने जीवन की वास्तविकता झुठला सकें।हम दूसरों के आगे जीवन भर रोते रहते हैं। हमें पता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा और न ही हमारी मुसीबतें कम होंगी। फिर भी हम अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। ज़रा सोचिए किसी को अपनी परेशानियां बताने से क्या हाल मिल जायेगा और अगर कोई दूसरा इन्सान इसका हल दे भी दे तो ये किस्सा कितने दिन चलेगा ?आप फिर नई मुसीबत आते ही किसी और को ढूंढोगे। इसका सीधा मतलब यह है कि आप हर परेशानी के लिए दूसरे पर आश्रित हो चुके हैं। आकर्षण का सिद्धांत ये कहता है कि हम जिस किसी वस्तु या भावना के बारे में ज्यादा सोचते हैं, उसे हम उतना ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसका मतलब है कि यदि हम ज्यादातर अपनी परेशानियों का रोना रोयेंगे और लगातार उसके बारे में सोचेंगे तो हमें और भी ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए परेशानियों और जीवन की समस्याओं पर रोना नहीं , बल्कि उन्हें हल करना,उनसे लड़ना सीखिए और हो सके तो उन पर हंसना शुरू कीजिए। फिर आपकी ज़िंदगी भी मुस्कुराने लगेगी।
No matter how much we move away from our reality. The truth can never change. Whether it is related to our identity or our current circumstances. Most of the people blame others and God when they face problems or cry about their bad times and think that someone should come and take pity on us. He should see what phase of life we are going through. If this doesn’t work then we throw ourselves into the blind well of addiction, just to deceive ourselves for a few moments that there is no sorrow in life anymore. After this, the next morning a new cry or drug addiction. This is what life has become. Crying over our circumstances is also a kind of addiction, due to which we can deny the reality of our life. We keep crying in front of others throughout our life. We know that this will not make any difference nor will our troubles reduce. Still we do not desist from our actions. Just imagine what kind of situation you will get by telling your problems to someone and even if someone else gives the solution, how long will this story continue? You will then look for someone else as soon as a new problem arises. This simply means that you have become dependent on others for every problem. The law of attraction says that the more we think about any object or emotion, the more we attract it towards us. This means that if we mostly cry about our problems and constantly think about them, we will have to face even more problems. Therefore, do not cry over the troubles and problems of life, but learn to solve them, fight them and if possible, start laughing at them. Then your life will also start smiling.
दिल क्या ढूंढे दिल क्या चाहे? क्यूं मारा मारा फिरता है? अब इसे कौन सी कमी हुई? जो बन बेचारा फिरता है। कभी मन्दिर में मत्थे टेकें, कभी गलियों की है खाक छनी। कभी दरगाहें कभी गुरुद्वारे, पर कहीं न कोई बात बनी। कुछ तो चाहे ये दिल मेरा, जो बन आवारा फिरता है। दिल क्या ढूंढे दिल क्या चाहे? क्यूं मारा मारा फिरता है? अब इसे कौन सी कमी हुई? जो बन बेचारा फिरता है। हर राहों पर ढूंढा इसको, कितनी सारी महफ़िल देखी। पर चकाचौंध की दुनियां में, खोजा जिसको मुझको न मिली। लख किए जतन है हार गया, अब हारा-हारा फिरता है। दिल क्या ढूंढे दिल क्या चाहे? क्यूं मारा मारा फिरता है? अब इसे कौन सी कमी हुई? जो बन बेचारा फिरता है। हां लौटा थककर आया मैं, घर की दहलीज़ के जब अन्दर। होकर बेफिक्र जो सर रक्खा, मैने अपनी मां के आंचल। है सुकून मिला जो ढूंढा रहा , था मैं अपने घर के बाहर। जिसकी खातिर दर-दर भटका, वो पाया है खुद के अन्दर। अब जान गया है दिल मेरा, क्यूं बन बंजारा फिरता है। ये क्या ढूंढे ये क्या चाहे, क्यूं मारा-मारा फिरता है। अब इसे कौन सी कमी हुई, जो बन बेचारा फिरता है।
What does the heart seek? What does the heart desire? Why does he roam around? Now what did it lack? Who wanders around like a pauper. Sometimes bow down in the temple, Sometimes the streets are filled with dust & ashes. Sometimes Dargahs,sometimes Gurudwaras, But somewhere something happened. This heart of mine wants something, Who wanders around like a vagabond. What does the heart seek? What does the heart desire? Why does he roam around? Now what did it lack? Who wanders around like a pauper. Saw so many gatherings. But in the world of glitz, Searched for something I couldn’t find. I tried my best but got defeated. Now he wanders around defeated. What does the heart seek? What does the heart desire? Why does he roam around? Now what did it lack? Who wanders around like a pauper. Yes, I came back tired. When inside the threshold of the house. Who kept his head carefree,I my mother’s lap. I have found the peace I was looking for. I was outside my house. For whom I wandered from door to door, He has found it within himself. Now my heart knows, Why does he roam around like a nomad? What does he seek, what does he want? Why does he wander around? Now what lack did it have? Who wanders around like a pauper.
“भागता रहा ज़िंदगी भर सुकुन के पीछे मगर मां की गोद जैसा सुकुन दुनियां में कहीं भी और नहीं।”
“I kept running after peace all my life, but there is no peace like mother’s lap anywhere else in the world.”
जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, हमें वो दूसरों को पहले देना पड़ेगा। तब जाकर हम उस लायक बन पाएंगे, कि किसी से कोई उम्मीद कर सकें।
What we want from others for ourselves, we have to give to others first. Only then will we be able to become worthy enough to have expectations from anyone.
हमारी एक बुरी आदत है कि हम अपने लिए दूसरों से अच्छे बर्ताव की उम्मीद करते हैं। हम चाहते हैं कि कोई हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दे और हमारी मदद करे। हमारा सम्मान करे, हमसे प्रेम करे, हमारी कमियों के साथ हमें अपनाए और हमारी बड़ी से बड़ी गलतियों पर हमें माफ़ भी कर दे। लेकिन क्या दूसरों को भी हमसे यही उम्मीद रखने का हक है? हम दूसरों में तो लाखों कमियां निकलते हैं।लेकिन क्या हमने खुद की खामियों पर कभी गौर किया है? अगर किसी से हमें वो नहीं मिल पाता जो हम उससे अपने लिए चाहते हैं तो वो हमारी निगाह में बुरा बन जाता है। लेकिन हमने उसके लिया क्या किया है, इस बात से हमें कोई भी मतलब नहीं है। हम ये बात भूल जाते हैं कि हम दूसरों को जो देते हैं वही दूसरों से पाते हैं। हम दूसरों को जो दे नहीं सकते वो हमें उनसे पाने की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।
One of our bad habits is that we expect good behavior from others. We want someone to support and help us in our bad times. Respect us, love us, accept us with our shortcomings and forgive us even our biggest mistakes. But do others also have the right to expect the same from us? We find millions of shortcomings in others. But have we ever noticed our own shortcomings? If we are not able to get what we want from someone then he becomes bad in our eyes. But we don’t care what we have done for him. We forget that what we give to others is what we get from others. What we cannot give to others, we should not expect to get from them.
उठो व्यर्थ की चिंता छोड़ो, यत्न करो विपदाएं मोड़ो। जीवन तो उस ओर पड़ा है, रोता क्यूं चुपचाप खड़ा है? रोने से कुछ हो जायेगा? अगर नहीं तो क्रंदन छोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। कुछ पल का छोटा सा जीवन, मृत्यु उठे कब संग ले जाए? समय कहा जो व्यर्थ करेगा? करना है कुछ और उपाय। कोशिश बिन रहने से अच्छा, कुछ कर भले हार हो जाय। हार गए तो क्या अन्तर है? अब हाय-हाय की आदत तोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। औरों के आगे रोने से, तेरा क्या कुछ बन भी पाया? किसने तेरे आंसू पोंछे? किसने तुझको धीर बंधाया? अगर रहा है कोई ऐसा? किसने कब तक साथ निभाया? सोच समझ है व्यर्थ ये रोना, अब शोक के सागर का मुख मोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। चिन्ता चिता समान है जिसमें, कितने ही जीवन राख हुए हैं। फ़र्क नही है एक ही डूबा, संग-संग अपने भी साथ रहे हैं। इस रोने की आदत ने ही, कितने ही घर बार डुबाए। जो हैं तेरे खातिर ; उनकी खातिर, अब ये कुंठा छोड़ो । उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो। उठो धनंजय चिन्ता छोड़ो।
Get up, give up unnecessary worries, Make efforts to divert the calamities. Life is lying on the other side, Why do you stand silently crying? Will crying do anything? If not, then stop crying. Get up Dhananjay. Stop worrying. Get up Dhananjay, stop worrying. Life is short for a few moments, When will death take you with it? Who will waste time? Some other solution has to be done. Instead of trying to fix nothing, Even if you do something and get defeated. What difference does it make if you lose? Now break the habit of complaining. Get up Dhananjay, stop worrying. Get up Dhananjay, stop worrying. Don’t cry in front of others. From, What could I achieve for you? Who wiped your tears? Who made you patient? If there is someone like this? Who supported you for how long? Thinking, this crying is in vain, Now you turn face of the ocean of sorrow. Get up Dhananjay, give up worrying. Get up Dhananjay, give up worrying. Worry is like a pyre in which, So many lives have been reduced to ashes. There is no difference, only one has drowned, I have been with myself as well. This habit of crying itself, Has sunk many a house. For the sake of who is there for you; For sake them, Now leave this frustration. Get up Dhananjay Chinta. Leave it. Get up Dhananjay, leave the worry.
पतझड़ के पत्तों सा टूटा , गिरा कहीं कुछ खुद मुझमें। अपनी कुछ उम्मीदें टूटी, संग-संग टूटे कुछ सपने। तिनका-तिनका बना घरौंदा, उजड़ा बिखरा राहों में। दिल का दर्द दिखेगा किसको? मुंह की कोई सुनता है क्या? मुंह की कोई सुनता है क्या? कुछ दिन-कुछ पल या कुछ बातें, थी चाह मेरी कोई सुनता। पर दूजे की परवाह किसे? है कौन यहां कुछ भी गुनता? बस मतलब की यहां यारी है, और मतलब की दुनियादारी। सब मतलब पर ही याद करें, सब मतलब पर परवाह करें। कितने घाव लगे इस दिल पर, देकर कोई गिनता है क्या? दिल का दर्द दिखेगा किसको? मुंह की कोई सुनता है क्या? मुंह की कोई सुनता है क्या? हर बार सोचकर कोशिश की, हर बार उम्मीदें करता हूं। है पता मुझे है बेमतलब, फिर भी तकलीफे चुनता हूं। जिन्हें खुद से ही लेना देना, उनको रिश्तों की कहां पड़ी? बस अपनी झोली भरने तक, रिश्तों का साथ निभाते हैं। किसकोअपने ज़ख्म दिखाएं ? मरहम भी कोई रखता है क्या? दिल का दर्द दिखेगा किसको? मुंह की कोई सुनता है क्या? मुंह की कोई सुनता है क्या?
हां मैं कोई नई बात नहीं बता रहा।सफलता के लिए कोई शॉर्ट कट नहीं होता।कोई भी नहीं। आपने सुना तो होगा सफलता समय मांगती है और जो समय नहीं दे सकता वो सफल भी नहीं हो सकता। मै इस बात को लेकर कोई उपदेश नहीं दे रहा।बस कुछ मुद्दे है जिन्हें मैं आपके सामने रखना चाहता हूं।
आजकल शॉर्टकट का ज़माना चल रहा हैं।हर कोई कम समय में बिना मेहनत या कम मेहनत करके बहुत जल्द ही सफ़लता चाहता है।आज के आधुनिक समय में धन को ही सफलता का मापदण्ड माना जाता है।जो जितना धनवान है वह उतना ही सफल समझा गया हैं।तो अब मुद्दे की बात पर आते हैं। इस भागदौड़ भरी दुनिया में सबके अपने-अपने सपने हैं,पर उनको हासिल करने की सीढ़ी पैसा बन चुका है।अब तो पैसे कमाने के लिए भी कई शॉर्टकट आ चुके है।
आज इंटरनेट का दौर चल रहा है। हर कोई इससे जुड़ा रहता है। बिना इन्टरनेट के एक पल भी बिताना मुश्किल हो चुका है।अब कई ऑनलाइन स्पोर्ट्स और गेमिंग प्लेटफार्म आ चुके हैं।जिन पर कुछ ही समय में लाखों रूपए जीते जा सकते हैं। अरे ….ये मैं नहीं कह रहा ।ये सोशल मीडिया पर चल रहे विज्ञापनों का कहना है। इसीलिए ये गेमिंग और स्पोर्ट्स एप हमारी नई पीढ़ी के आकर्षण का केन्द्र बने बैठे हैं।हर कोई मिनटों में लखपति या करोड़पति बनने के सपने में खोया हुआ है।
हम पैसे गवा रहे हैं और पैसा कोई और ही छाप रहा है।हम लोगों के पैसे से ही चन्द विजेताओं को ईनाम देकर ये करोड़ों खुद हज़म करते जा रहे हैं। आज करोड़ों लोग ऑनलाइन सट्टा लगा रहे हैं और उसमें चन्द ही विजेता होते है जिन्हें कोई बड़ी राशि मिलती है।
तकलीफ तो इस बात की है कि आज ज्यादतर सेलेब्रिटी जिन्हें हम और आप अपना रोल मॉडल मानते है,कुछ चंद पैसों के लिए इन सट्टेबाजी वाले प्लेटफार्म्स का भर भरकर प्रमोशन कर रहे हैं। और बात यहां तक ही नहीं है ये जानलेवा नशीले पदार्थों का भी जी खोलकर प्रचार प्रसार करते हैं।आज फिल्मी एक्टर्स और स्पोर्ट्सपर्सन जिनसे हम प्रेरित होते हैं वो ही हमें राह दिखाने के स्थान पर राह भटका रहे है। पैसे के आगे उन्हें जनता तो विश्वास दिखाई नहीं देता।इस मुद्दे हमारी सरकार भी कुछ नहीं कर रही उन्हें टैक्स तो मिल ही रहा है।
जो इस प्रकार के हानिकारक विज्ञापन होते है, उनमें एक आम बात है-खोखली चेतावनी……। जैसे तम्बाकू से कैंसर होता है,शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है,इस खेल में आदत लगना और वित्तीय जोखिम शामिल है कृपया समझदारी और जिम्मेदारी से खेलें आदि। ये सारे स्लोगन एक जरिया बन गए है,अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का।बस स्लोगन चिपकाओ और जिम्मेदारी से बच जाओ।अगर कोई समस्या आती है तो यह कहकर निकल जाना है।”चेतावनी पढ़ी या सुनी नहीं छोटे बच्चे हों क्या?”बस इतना काफ़ी है अपनी जान छुड़ाने के लिए।
इनका जो है सो है अपना क्या है-दारू पियो मौज उड़ाओ, गुटखा खाओ थूकते जाओ और मन करे तो सट्टा लगाओ और एक मिनट में रोडपति से करोड़पति हो जाओ….।सच कहें तो हमे अपने पैसे की कदर ही नहीं है और न ही हम में सब्र है। सभी जानते है कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत, फिर भी हम अंधे कुएं में छलांग लगाते रहते हैं। हमारी शॉर्टकट लेने की फितरत जो हो चुकी है।
एक छोटी सी बात समझो और खुद से सवाल करो कि जो भी लोग इन घटिया और हानिकारक चीजों और प्लेटफार्म्स का प्रचार करते है।क्या उन्होने इस प्रकार की चीज़ों का इस्तेमाल भी कभी किया है?अगर हां, तो कम से कम उनका तो नहीं जिन्हें वो जनता के आगे परोस रहे हैं।
कड़वा सच है कि अगर सट्टेबाजी से करोड़पति बनना इतना ही आसान होता तो ये सारे सेलिब्रिटी अपना सब काम छोड़कर अपने मोबाइल पर ही सट्टा लगा रहे होते। इसीलिए अब हमें अपनी आंखें खोलने की जरूरत है क्योंकि सट्टेबाजी लक का गेम है,मेहनत और प्रैक्टिस का नहीं। ये बस पैसे वालों के शौक हैं। अगर उनका कुछ चला भी गया तो वो खुद को संभाल लेंगे मगर आप……?। हम सभी ज्यादातर मिडिल क्लास और गरीब लोग हैं।समझो अगर आपका लक इतना ही अच्छा होता तो आप ये सट्टे नहीं लगा रहे होते। बल्कि किसी अमीर घराने में पैदा हुए होते और ठाठ से जीवन जी रहे होते।
इसलिए अपनी आंखे खोलिए और अब जागिए क्योंकि अगर आपकी किस्मत चमकी और पैसा शॉर्टकट से मिल भी गया तो उसकी कद्र नहीं होगी।आप उसे संभाल नहीं पाएंगे और आप अगला सट्टा खेलते नज़र आयेंगे।
इसलिए आप अपने पैसे और वक्त की कीमत समझो और अब अपने हुनर पर काम करो। मेहनत करो,नई स्किल्स सीखो,जो आगे चलकर आपके काम आयेंगी। यूं खुद को बर्बाद करने से कुछ नहीं होता।अब निर्णय आपका है आप क्या चुनते है भाग्य का साथ या स्वयं के कर्म पर विश्वास।फैसला और जिम्मेदारी केवल और केवल आपकी है।
नोट: मेरा मकसद किसी का भी अपमान करना या किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है। बस आपको आइना दिखाने की कोशिश की है। फिर भी यदि अगर आपकी भावनाओं को ठेस पहुंची हो,तो क्षमा प्रार्थी हूं।
Yes, I am not telling anything new. There is no short cut to success. None. You must have heard that success demands time and one who cannot give time cannot be successful. I am not giving any sermon on this matter. There are just some issues which I want to put before you.
Nowadays, the era of shortcuts is going on. Everyone wants to achieve success in a short period of time without or with less hard work. In today’s modern times, money is considered the only criterion of success. The wealthier one is, the more successful one is considered to be. So now we have come to the point of the issue. In this fast-paced world, everyone has their own dreams, but money has become the ladder to achieve them. Now many shortcuts have emerged to earn money.
Today the era of internet is going on. Everyone remains connected to it. It has become difficult to spend even a moment without internet. Now many online sports and gaming platforms have come on which lakhs of rupees can be won in a short time. Hey…I am not saying this. This is what the advertisements running on social media say. That is why these gaming and sports apps have become the center of attraction of our new generation. Everyone is lost in the dream of becoming a lakhpati or crorepati within minutes.
We are losing money and someone else is printing the money. By giving rewards to a few winners with our people’s money, they are consuming crores of rupees themselves. Today crores of people are betting online and there are only a few winners who get a huge amount of money.
The problem is that today most of the celebrities, whom we and you consider as our role models, are heavily promoting these betting platforms for a few bucks. And this is not all, they also openly promote deadly drugs. Today, the film actors and sports persons from whom we are inspired are misleading us instead of showing us the path. They don’t see public trust in front of money.Even our government is not doing anything on this issue, they are still getting taxes.
These types of harmful advertisements have one thing in common – hollow warnings. Like tobacco causes cancer, alcohol is injurious to health, this game involves habit forming and financial risk so please play wisely and responsibly etc. All these slogans have become a means to shirk one’s social responsibilities. Just stick the slogan and escape from the responsibility. If any problem arises, then go away saying “Have you not read or heard the warning? Are there small children?” This is enough to save your life.
What’s theirs is what’s yours – drink alcohol, have fun, eat gutkha, spit and if you feel like, bet and in a minute you can become a millionaire from a road pati…. To tell the truth, we do not value our money and Nor do we have patience. Everyone knows what is right and what is wrong for us, yet we keep jumping into the blind well. It has become our habit to take shortcuts.
Understand one small thing and ask yourself why those people promote these bad and harmful things and platforms. Have they ever used such things? If yes, then at least not those whom they are presenting in front of public.
The bitter truth is that if it were so easy to become a millionaire through betting, then all these celebrities would have left all their work and were betting on their mobiles. That is why now we need to open our eyes because betting is a game of luck, not of hard work and practice. These are just the hobbies of the rich. Even if he loses something, he will take care of himself but you…?We all are mostly middle class and poor people. Understand that if your luck was so good then you would not be making these bets. Rather, he would have been born in a rich family and would have been living a luxurious life.
So open your eyes and wake up now because even if you get lucky and get money through a shortcut, it will not be valued. You will not be able to handle it and you will be seen playing the next betting game.
Therefore, understand the value of your money and time and now work on your skills. Work hard, learn new skills, which will be useful to you in future. Nothing is achieved by ruining yourself like this. Now the decision is yours. Do you choose to follow luck or believe in your own karma. The decision and responsibility is yours and only yours.
Note: My intention is not to insult anyone or hurt anyone’s sentiments. Just tried to show you a mirror. Still, if your sentiments have been hurt, I apologize.
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब दूर दराज़ कहीं खुले वातावरण में खासकर शादी या त्योहारों में जब भी कहीं कोई गाना बज रहा होता है तो हम भी जाने अनजाने में वही धुन या गीत गुनगुनाने लगते हैं।ये तो सभी जानते है कि ध्वनि एक तरंग ऊर्जा है और इसे प्रसारित होने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ध्वनि भी सकारात्मक और नकारात्मक प्रकृति की होती है। मैं कोई विशेषज्ञ तो नहीं लेकिन ध्वनि भी भावनाओं से प्रभावित होती है।जब भी आप कोई भूतिया मूवी देखने जाते हो तो आप जो बैकग्राउंड म्यूजिक सुनते हो या कोई दर्द भरा गीत सुनते हो तो उसमें एक नकारात्मक ऊर्जा होती है जो आपके मन-मस्तिष्क को प्रभावित करती है।ठीक जैसे जब हम मन्दिर जाते हैं या अपने पूजा घर में शंख और घंटियों की ध्वनि सुनते हैं तो मन को एक अलग सी शान्ति मिलती है। उदाहरण के लिए अगर बांसुरी की ही बात की जाय तो उससे उत्पन्न ध्वनि सुनकर हमारा मन सुख भी अनुभव कर सकता है और दुःख में डूब भी सकता है। कहने का मतलब ये है कि जैसे बांसुरी की ध्वनि किसी वादक की भावनाओ से प्रभावित होती है ठीक उसी प्रकार हम भी ध्वनि की प्रकृति से प्रभावित होते हैं। यदि ध्वनि सकारात्मक है तो हम प्रसन्न और यदि नकारात्मक है तो हम दुख का अनुभव करते है।यही बात हमारे द्वारा कहे जाने वाले शब्दों पर भी निर्भर है। यदि हम किसी को नकारात्मक वाणी बोलते है तो उस व्यक्ति का मन दुखी होता है या उसके मन में दुर्भावना उत्पन्न होती है और जब हम किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देते हैं या उससे अच्छी बातें करते हैं तो वह प्रसन्न हो जाता है। अतः ध्वनि भी सकारात्मक और नकारात्मक प्रकृति की होती है हमारे विचारों और भावनाओं को प्रभावित करती है।
इतना भी कुछ गिला नहीं है, जो भी चाहा मिला नहीं है। पर इसका सीधा मतलब समझो, मन से पथ पर चला नहीं है। ऐसा भी क्या दुष्कर जग में ? जो मानव संकल्प न साधे। नदिया-पर्वत-बंजर-अम्बर, मानव हठ सम्मुख शीश नवाते। जब भी स्वेच्छित वर पाना हो, कर्म तपस्या करनी होगी। जीवन कितना भी मुश्किल हो, तुझको कोशिश करनी होगी। तुझको कोशिश करनी होगी। क्या मोल भला उन पदकों का, आसानी से जो हांथ लगें। अरे बात तो तब हो जब रण में, अर्जुन और कर्ण के बाण चले। जीवन के लक्ष्य कहां सस्ते, दो पग चलकर जो साधित हों। यह यत्नों की रणभूमि है , बिन स्वेद(पसीना) कहां परिभाषित हों। है द्वंद्व अटल तेरा विधि से, तो विधियां पूरी करनी होंगी। जीवन कितना भी मुश्किल हो, तुझको कोशिश करनी होगी। तुझको कोशिश करनी होगी। कितने सपने दम तोड़ रहे, हर दिल में यूं ही घुट-घुट कर। कुछ साधन बिन-कुछ कोशिश बिन, कुछ बेमन यूं ही लुट-लुट कर। पर जब मंज़िल का ही पता नहीं, ना तुझमें चलने की ज़िद है। तो बोल भला कैसे लेगा? तेरे हित जो अपेक्षित है। है द्वंद्व तेरा खुद ही खुद से, तुझको जय निश्चित करनी होगी। जीवन कितना भी मुश्किल हो, तुझको कोशिश करनी होगी। तुझको कोशिश करनी होगी।
जब भी हम अपने जीवन में कुछ भी पाना चाहते हैं तो हमें अपने लक्ष्य के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और साथ ही साथ कुछ त्याग भी करने पड़ते हैं। इस दौरान हमें जीत और दोनों का ही सामना करना पड़ता है। जब हम जीतते हैं तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं होता और हम आत्मविश्वास से भर जाते हैं। किन्तु जब भी हम हारते हैं तो हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है और ऐसी हालात में हम हार मानकर कोशिश करना ही छोड़ देते हैं। हम हार गए इसका मतलब ये तो नहीं कि उस लक्ष्य को हासिल करना हमारे बस की बात ही नहीं है। बल्कि यह है कि हमनें उसे दिल से चाहा ही नहीं। किसी भी लक्ष्य को पाने का सबसे आसान तरीका यह है कि उसे उतना ही ज़रूरी बना दिया जाय जितना हमारे ज़िंदा रहने के लिए सांसें लेना ज़रूरी हैं। अगर ये कर लिया तो इस दुनिया में कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं है।
Whenever we want to achieve anything in our life, we have to work hard for our goal and also make some sacrifices. During this time we have to face both victory and defeat. When we win, our happiness knows no bounds and we are filled with confidence. But whenever we lose, our confidence gets shaken and in such situations we give up and stop trying. Just because we lost does not mean that it is not within our power to achieve that goal. Rather it is that we did not love it from our heart. The easiest way to achieve any goal is to make it as important as breathing is to our survival. If you do this then it is not difficult to achieve anything in this world.
कोई व्यंग्य बाण से हो आहत, पर अधरों पर मुस्कान लिए। चलता रहता हो अविचल सा, कड़वी बातों से ज्ञान लिए। बाधाओं से अविरत लड़कर, वो ही इतिहास बनाते हैं। जिनके मुख पर हो मौन सजा, इक दिन वो पूजे जाते है। अपमान से हारा कौन यहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? है दो शब्दों का मेल मात्र, पर अद्भुत क्षमता का श्रोत यही। जब जुड़ा रहा सद्भावों से, निर्माण से ओत व प्रोत यही। यदि मूल छिपी इसके कटुता, या बैर भाव से हो दूषित। तब महाविनाश का शस्त्र ये बन, मानव का नाश कराती है। जीवन-विनाश इस पर निर्भर, किस भाव ने धारा मौन यहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? जो गरजे ना बरसे बादल, जो बरसे ना गरजे बादल। जब मुख से फूटे शब्द ध्वनि, संकल्प के पांव करे घायल। निज भावों से उपर उठकर, कुछ करके जो दिखलाते हैं। जिनके मुख पर हो मौन सजा, एक दिन वो पूजे जाते हैं। दुर्भाव से हारा कौन यहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? प्रायः ऐसा ही होता है, मुख करते हैं आघात यहां। दूजे के हिय की पीड़ा का, किसको होता आभास यहां? खल को ना अपने कर्म खले, ना अपने कल की हो चिन्ता। बस प्राण बसे अपकार में ही, मुख से करते विष की वर्षा। उपहास-अपमान के बाणों से, हो घायल जो मुस्काते हैं। जिनके मुख पर हो मौन सजा, एक दिन वो पूजे जाते हैं। कटु शब्द से हारा कौन यहां? जो मौन रहा वो मौन कहां? जो मौन रहा वो मौन कहां?
मौन में बड़ी शक्ति होती है। हम जब अपनी भावनाओं को दबाते है अर्थात् प्रर्दशित नहीं करते हैं तो उसमें अपार शक्ति संचित हो जाती है। जिसका उपयोग आप चाहें तो निर्माण के लिए करें अथवा विनाश के लिए, यह आप पर निर्भर है। उदाहरण के लिए जैसे कोई आपका अपमान करता है;आपको नीचा दिखाता है तो आपके पास उसे प्रतुत्तर देने के दो विकल्प हैं। पहला उसे तुरन्त प्रत्युत्तर देकर अर्थात् अपमान के बदले अपमान करके और दूसरा उसे भविष्य में निरुत्तर करके। आप भविष्य में अपना जवाब भी उसे दो तरीकों से दे सकते हैं। पहला भविष्य में उससे अपने अपमान का बदला लेकर अर्थात् उसे कष्ट पहुंचाकर और दूसरा अपने कर्मों से उसकी बोलती बन्द कराके।यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने अपमान के बदले उसका अहित करते हैं या अपनी सफलता से उसे गलत साबित करके उससे बदला लेते हैं। यदि आप उसका बुरा करेंगे तो आप खुले तौर पर उसे अपना दुश्मन बना लेंगे जो आपको हानि पहुंचाने का प्रयत्न करेगा और इससे आपका चरित्र भी दुष्प्रभावित होगा फिर आप भी उसकी ही तरह बन जायेंगे। या फिर इसके ठीक विपरीत आप अपनी उपलब्धियों से; अपनी सफलता से उसे प्रतुत्तर दे सकते हैं। जिससे वह स्वयं ही लज्जित हो जायेगा और अगली बार आपसे दुबारा दुर्व्यवहार नहीं करेगा। चयन आपका है कि आप अपमान के बदले अपमान करते हुए अपनी सज्जनता का नाश करते हैं या अपने कर्मों से ऐसे लोगों को निरुत्तर करते हैं। विचार अवश्य कीजिए।
There is great power in silence. When we suppress our emotions, that is, do not show them, immense power gets accumulated in it. Whether you want to use it for construction or destruction, it is up to you. For example, if someone insults you or puts you down, you have two options to respond to him. First by giving him immediate response i.e. by insulting him in return for insult and secondly by leaving him speechless in the future. You can also give your answer to him in two ways. First by taking revenge of your insult from him in the future by causing him pain and second by making him stop speaking through your actions. It depends on you whether you harm him in return for your insult or take revenge from him by proving him wrong with your success. . If you do bad to him then you will openly make him your enemy who will try to harm you and this will affect your character also and then you too will become like him. Or just the opposite, with your achievements; You can respond to him with your success. Due to which he himself will feel embarrassed and will not misbehave with you again next time. The choice is yours whether you destroy your gentlemanly self by giving insult for insult or render such people speechless with your actions. Please think about it.
लोग कहते हैं कि इन्सान को वक्त के साथ साथ खुद को बदलना चाहिए। पर मैने लोगों को अपनी ज़रूरत के साथ ही बदलते देखा है।
जब आपका बुरा समय शुरू होता है तो आपके अपने, आपके सम्बन्धी सभी आपसे किनारा करने लगते है । जो आपके अच्छे दिनों में आपके साथ थे वो आपसे मिलने से कतराते हैं कि कहीं मिलते ही आप;उनसे कोई मदद न मांग ले और अगर आप उनसे मदद मांग भी लेते हैं तो अक्सर बहाने बनाकर आपकी बात टाल दी जाती है। ऐसे लोगों से दूर रहने और अपना काम से काम रखने का प्रयास करें। आप सुखी रहेंगे।
अक्सर ये सोचता था बड़ी तकलीफ़ है मुझे, पर ये आंख खुल गई जो निगाहें उधर गई। सड़कों के किनारे पे कचरे में हाथ में से, कोई शख्स मुझको आज रोटी उठाता हुआ मिला।
I often thought that I was in a lot of trouble, but my eyes were opened today when my eyes went to the place where I saw someone picking up bread from the garbage heap on the roadside.
भूख बड़ी ज़ालिम होती है कभी ये नहीं देखती आपके पास उसे देने के लिए कुछ है या नहीं।बस लग जाती है। रोटी इन्सान की सबसे पहली ज़रूरत है बाकी चीजें तो इसके बाद ही आती हैं। पेट की आग बहुत तेज़ होती है । इसने कितनों के ही घर जला दिए है,कितनों को ही मार डाला है और कितनों को ही मजबूर कर रही है अनचाहा या गलत काम करने के लिए, खासकर छोटे बच्चों को।जिनके हाथ में किताबे और आंखों में सुनहरे सपने होने चाहिए थे,उनके हांथ में कचरे की बोरी और आंखो में भूख की तड़प है।कही कोई अपना बचपन छोड़कर कमाने निकल पड़ा है तो कहीं कोई चोरी करके अपना पेट पालने को मजबूर है। इस विषय को छोटे से अंश में पूर्ण रूप से वर्णित करना संभव नहीं है। इसलिए बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आप उनकी सहायता करे न करें को सक्षम हैं पर उनकी सहायता करने से न चूकें जो असक्षम हैं। यही मानवता है जो हमें पशुओं से भिन्न बनाती है।
Hunger is very cruel, it never checks whether you have anything to give it or not. It just needs to eat something. Bread is the first need of a human being, other things come only after it. The stomach fire is very strong. It has burnt down so many houses, killed so many people and is forcing so many to do unwanted or wrong things, especially small children. Those who should have had books in their hands and golden dreams in their eyes, There is a sack of garbage in his hand and the pain of hunger in his eyes. Some people have left their childhood and set out to earn money while others are forced to survive by stealing. It is not possible to describe this topic completely in a small excerpt. So all I would like to say is that even if you do not help those who are capable, do not miss helping those who are unable. It is humanity that makes us different from animals.
यहां हूं दर बदर भटका मैं तेरी चाह में लेकिन, न तेरा अक्स ही देखा न तेरी आहटें पाईं। भटकता चाह में तेरी कहीं तो पा सकूं तुझको, मगर मैं ही नहीं हर शख्स तुझको ढूंढता होगा।
Here I have wandered from place to place in search of you, but neither have I seen your reflection nor found your voice. I wander longing for you, I wish I could find you somewhere, but not only I, but every person must be searching for you.
हम दुनिया की चकाचौंध में खोए रहते हैं और बाहर खुशियों की तलाश करते हैं जिससे हमें सुकून मिल सके; शांति मिल सके। लेकिन हम जब भी खुद को दूर से देखते हैं , तो खुद को अकेला पाते हैं। सच कहें तो असली सुकून बाहर नहीं खुद के दिल के भीतर होना चाहिए। लेकिन इसी सुकून की तलाश में हम ज़िंदगी भर बाहर भटकते रहते हैं।
We remain lost in the glamor of the world and look for happiness outside which can give us peace. But whenever we look at ourselves from a distance, we find ourselves alone. To be honest, real peace should not be outside but within one’s own heart. But in search of this peace we keep wandering outside throughout our lives.
कुछ करने के बदले स्वयं को कुछ मिलने या पाने की संभावना का भाव ही आशा है।तो फ़िर निराशा क्या है?उत्तर है आशा का टूट जाना या अपने मानदंडों पर खरा न उतरना।
जब भी हम किसी के लिए या अपने लिए कुछ करते हैं तो उससे एक आशा जुड़ जाती है कि अंत में हमें ये मिलेगा या फिर हमारे साथ ऐसा होगा परन्तु यदि हमें हमारी सोच के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं तो फ़िर वहां से हमारे अंतरमन में निराशा का जन्म होता है। जो हमारे दुखों का मूल कारण है।
जब भी हम निराश होते हैं तो हमें मानसिक कष्ट की अनुभूति होती है और यही मानसिक कष्ट ही दुःख कहलाता है। ये दुःख हमें अन्दर तक तोड़ देता है और हमारा सुख-चैन सब कुछ छीन लेता है। तब हमारा जीवन अन्धकार से घिर जाता है। तो क्या तरीका है इस दुःख से बाहर निकलने का; इससे पार पाने का।
दुःख से मुक्ति…..?यह एक अत्यन्त जटिल प्रश्न है, जिसका हल ढूंढने का प्रयास युगों-युगों से चलता आ रहा है। कई ऋषियों,महात्माओं, ज्ञानियों,साधुओं और संतों ने इस गूढ़ तथ्य का हल ढूंढने में अपना जीवन लगा दिया। फिर एक उत्तर मिला-“जो दुःख का मूल कारण है उससे दूर रहो”। आज इस उत्तर का अर्थ सभी के लिए अलग अलग है। हमने अपनी सोच-समझ के अनुरूप इसका भिन्न भिन्न अर्थ लगा लिया है।
आज अपने दुखों से सभी मुक्ति चाहते हैं परन्तु इसके कारण पर कोई विचार नहीं करता। किसी के लिए पैसे की कमी दुःख का कारण है तो किसी के लिए अपनों का साथ न देना। किसी को ईश्वर प्राप्ति में दुःख से मुक्ति दिखाई देती है तो किसी को सांसारिक भोग-विलास में। कोई असफल होने पर दुःख है तो कोई इच्छा की पूर्ति न होने से। इसके लिए किसी ने घर छोड़ा,तो किसी ने परिवार,किसी ने सन्यास लिया, तो किसी ने धन प्राप्ति में ख़ुद को झोंक दिया। परन्तु किसी को भी उसके दुख से मुक्ति नहीं मिली।
तो क्या है दुखों से मुक्ति का रहस्य जो हमारे समझ से परे है। आपको ज्ञात होगा कि जब आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे तो आपके मन में इससे बचने का क्या उपाय सूझा जो था धन कमाना। अब आपने सोचा कि इससे आपका दुख कम होगा। पर इससे बस आपकी समस्याएं कम हुईं,आपका दुख नहीं।अब आपकी आवश्यकता और इच्छा बढ़ी और आप फिर आशा करते हैं कि और अधिक धन आपकी समस्या को सुलझा देगा।लेकिन फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।अब जो अपने आशा की वो निराशा में और आपकी निराशा दुःख में बदल गई। और आप फिर वहीं हैं जहां से आपने शुरू किया था।
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में दुखों से मुक्ति का मार्ग बताया है,उन्होने कहा है कि “कर्म करो,फल की चिंता मत करो”। अर्थात् अपना कर्त्तव्य तो करते जाओ परन्तु उसके पश्चात् मिलने वाले परिणाम की चिंता भूल जाओ। इसका एक अलग अर्थ यह भी है कि अपने कर्मों के बदले कुछ मिलने की आशा त्याग दो। यदि इसे ही छोड़ दिया तो इसके टूटने पर होने वाली निराशा और दुख नहीं होगा।
इसलिए यदि हम अपने या किसी के लिए कुछ कर रहे हों तो हमे उसके बाद जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए। जैसे आपने बुरे समय किसी का साथ दिया तो यह आशा न करें कि वो भी आपके बुरे समय में आपका साथ देगा। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप हताश और निराश होंगे जो आपको दुख पहुंचाएगा। इस प्रश्न का यही उत्तर है कि किसी व्यक्ति या वस्तु के लिए कर्म करो मगर उम्मीद नहीं क्योंकि अगर ये टूटी तो आप भी टूट जाओगे। इसके स्थान पर अपने मन में संतोष और धीरज को धारण कर आप मानसिक दुख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि यह करना अत्यन्त कठिन है पर असंभव नहीं।
जय एक दिवस की बात नहीं, वर्षों का अथक परिश्रम है। संकल्पों की ये गाथा है, संघर्ष भरा इक जीवन है। जय एक दिवस की बात नहीं, वर्षो का अथक परिश्रम है…..। हां विजय स्वप्न को लक्ष्य बना, मानव जब जग से लड़ता है। तब ही जयघोष स्वर्ण मुकुट, योद्धा के सिर पर सजता है। पर ये पथ भी आसान कहां, जितना गाथाएं सुन लगता। बाधाओं से टकराए बिन, इस जग में कहां कुछ भी मिलता। जय एक दिवस की बात नहीं, वर्षो का अथक परिश्रम है। संकल्पों की ये गाथा है, संघर्ष भरा इक जीवन है। जब भी कोई संकल्प करे, अपने ही पथ भटकाते है। कभी बहलाकर-कभी समझाकर, कभी भय से रह भुलाते है। गर साथ भी दे दें अपने तो, औरों से लड़ना पड़ता है। लोगों की पैनी बातों से, पल-प्रतिपल बचना पड़ता है। जो शंकाओं,उपहासों के, काटों को मन में बोते हैं। बच कर रहना उन लोगों से, जो वास्तव में शत्रु होते हैं। यदि पार हो चुकी हर विपदा, तो दर्पण में खुद को देखो। जो देख रहा है अब तुमको, वो अब आखिर की बाधा है। जय एक दिवस की बात नहीं, वर्षो का अथक परिश्रम है। संकल्पों की ये गाथा है, संघर्ष भरा इक जीवन है। अब बात है अन्त समस्या की, खुद से ही खुद लड़ना होगा। खुद के मन के बहकावे से, हर पल तुमको बचना होगा। सुख में तुमको भटकाएगा, आलस की राह दिखायेगा। ये कष्टों से डर बोलेगा, अब तुमसे ना हो पाएगा। इससे लड़ना आसान नहीं, मन हर क्षण पथ भटकता है। जिसने साधा अपने मन को, निश्चित ही जय कर जाता है। जय एक दिवस की बात नहीं, वर्षो का अथक परिश्रम है। संकल्पों की ये गाथा है, संघर्ष भरा इक जीवन है।
Victory is not a matter of one day,it is years of tireless work.This is a story of resolutions, a life full of struggle. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work… Yes, victory becomes the goal of dreams when a person fights with the world. Only then does the golden crown of victory adorn the warrior’s head. But isn’t this path easy, no matter how many stories you hear? It seems. Where can anything be achieved in this world without hitting obstacles. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work. This is a saga of resolutions, a life full of struggle. Whenever someone makes a resolution, his own people start diverting him from the path. Sometimes by coaxing, sometimes by convincing, sometimes by scaring him, he is asked to forget his goal. Even if we support ourselves, we have to fight with others. We have to avoid sharp words from people at every moment. People who sow doubt in the mind, ridicule others, sow thorns in the mind. Stay away from those people who are actually my real enemies. If you have overcome every adversity, then look at yourself in the mirror. The one who is looking at you now is the last hurdle. Jai, it is not a matter of one day, it is years of tireless work. This is a story of resolutions, a life full of struggle. Now coming to the last problem, you will have to fight with yourself. From the illusion of one’s own mind. , you have to survive every moment. It will lead you astray in happiness, it will show you the path of laziness. It will make you afraid of pain, you will not be able to handle it anymore. It is not easy to fight this, the mind wanders every now and then. For a moment the person forgets his path. He who corrects his mind definitely wins. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work. This is a story of resolutions and struggle. It is a complete life.
वक्त तो लगता है तराशने में खुद को, कामयाबी की चमक चेहरे पर यूं ही नहीं आती।
It takes time to hone yourself, the glow of success does not appear on your face just like that.
अक्सर हमारी सोच यही होती है कि हम जल्दी से कामयाब हो जाए;सफल हो जाए। लेकिन सफलता वक्त लेती है यूं नहीं मिलती। उसके लिए दिन-रात लगन के साथ मेहनत करनी पड़ती है। जैसे ईंट का मकान भी कभी एक दिन में नहीं बनता उसके लिए लम्बी योजना बनानी पड़ती है।सबसे पहले हम ज़मीन खरीदते हैं और फिर नींव डाली जाती है। जब नींव पकती है और तब कहीं जाकर मकान बनना शुरू होता है और मकान भी रहने लायक यूं हीं नहीं बन जाता। उसके लिए महीनों का वक्त लगता है। ठीक उसी तरह सफल होने के लिए भी योजना और उस पर अमल किया जाना ज़रूरी है। यूं हांथ पर हाथ धरे रहने के बाद ये उम्मीद करना बेवकूफी है कि हम एक दिन उठेंगे और झण्डे गाड़ देंगे। इसीलिए ख़ुद और खुद के प्रयासों को वक्त दीजिए क्योंकि चमत्कार सभी के साथ नहीं होते।
Often our thinking is that we should achieve success quickly. But success takes time and is not achieved just like that. For that one has to work diligently day and night. Just like a brick house is never built in a day, a long plan has to be made for it. First of all we buy land and then the foundation is laid. When the foundation is ready and then the construction of a house starts and the house also does not become habitable just like that. It takes months for that. Similarly, to be successful, it is important to plan and implement it. After sitting idle like this, it is foolish to expect that one day we will wake up and achieve success. Therefore, give time to yourself and your efforts because miracles do not happen to everyone.
प्रकृति अर्थात् मां;जो जन्म देती है,सृजन है या यूं कहें कि हमें पालती है,हमारा भरण पोषण करती है।जैसे मां अपने बच्चे को 9 महीने अपने गर्भ में धारण करती है और उसका ख्याल रखती है,वैसे ही प्रकृति भी हमें चारों ओर से घेरे हुए ;अपने भीतर धारण किए हुए है। पर मां सिर्फ़ अपने बच्चे का ख्याल ही नहीं रखती बल्कि उसे शिक्षित भी करती है उसे सही और गलत का पाठ भी पढ़ाती है।ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी हमें सिखाने का प्रयास करती है।प्रकृति ज्ञान का भण्डार है,इसमें अनेकों सजीव और निर्जीव वास करते हैं। किन्तु हमें सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जिनमें सबसे पहली और बड़ी सीख है निस्वार्थ सेवा भावना। सूर्य,चन्द्रमा,धरती, आकाश, हवा, नदियां,पहाड़,पेड़-पौधे आदि सभी निस्वार्थ सेवा भाव रखते हैं। इन्होंने आज तक हमसे अपने लिए कुछ भी नहीं मांगा बल्कि हमें सदैव केवल दिया ही है।पेड़ों ने अपने फल नहीं खाएं,नदियों ने अपना पानी नहीं पिया,सूर्य और चंद्रमा अपना प्रकाश स्वयं नहीं लेते। इन्होंने अपने लिए कभी भी कुछ भी नहीं रखा। अब यहीं से दान और परोपकार की भावना का जन्म होता है।इसी प्रकार धरती से हमें धैर्य और सहनशक्ति तथा आकाश से विशाल हृदय बनने की सीख मिलती है। पहाड़ों से दृढ़ निश्चय और लक्ष्य से विचलित न होने तथा नदियों से हमें समानता की शिक्षा मिलती है।सूर्य हमें नियमितता और निरंतरता की शिक्षा तो देता ही है साथ ही साथ हमें दूसरों को सही राह दिखाना भी सिखाता है। चन्द्रमा से हमें बुरे समय व निराशा में मन को शान्त रखने और चींटी से अथक परिश्रम की शिक्षा मिलती है। ऐसे ही प्रकृति में हर किसी से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। ज़रूरत है बस उसे समझने की,उसे महसूस करने की। इसलिए प्रकृति को समझने और उससे जुड़ने का प्रयास करें उसे मिटाने का नहीं।
Nature means mother; who gives birth, creates or can say that nurtures us. Just like a mother carries her child in her womb for 9 months and takes care of him, similarly nature also surrounds us. Surrounded from all sides and holding it within itself. But the mother not only takes care of her child but also educates him, teaches him the lesson of right and wrong. In the same way, nature also tries to teach us. Nature is a storehouse of knowledge, there are many living and non-living things in it. We do. But we get to learn something from everyone. The first and biggest lesson in which is the spirit of selfless service. Sun, moon, earth, sky, air, rivers, mountains, trees and plants etc. all have selfless service. He has not asked us for anything till today, but has always given us only. Trees do not eat their fruits, rivers do not drink their water, sun and moon do not take their own light. He never kept anything for himself. Now it is from here that the spirit of charity and charity is born. Similarly, we learn patience and tolerance from the earth and a big heart from the sky. From the mountains we learn determination and not to be distracted from the goal and from the rivers we learn commonality. Sun not only teaches us regularity and continuity but also teaches us to show the right path to others. From the moon, we learn to keep our mind calm in bad times and despair, and from the ant we learn to work tirelessly. Similarly in nature one gets to learn something or the other from everyone. You just need to understand it, feel it. That’s why try to understand nature and connect with it, not to destroy it.
कैसे छोटा सा बीज कोई, एक वृहत वृक्ष बन जाता है। कैसे माटी का इक ढेला, जल में हिल्लोल(तरंग)बनाता है। जग में प्रभु की जो भी रचना, उसका अब मोल हु समझाता। यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। नन्ही सी चींटी को देखो, कैसे जी जान लगाती है। कैसे छोटी की नाव कोई, तूफानों से टकराती है। दृढ़ हो निश्चय संकल्प-अटल, सब कुछ संभव है हो जाता। यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। कैसे वेगित हो जल धारा, पाषाण चीर बढ़ जाती है। देखो कैसे जल की बूंदे, मिलकर सागर बन जाती है। जलते दीपक से तुम सीखो, अंधेरे से है लड़ जाता। यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। निर्जीव-सजीव जो हैं जग में, सबकी अपनी-अपनी प्रभुता। स्वयंमेव से तुच्छ बनो न कभी, प्रभु ने सौंपी अदभुत क्षमता। जैसे छोटे से पग धरके, कोई पथ लंघन कर जाता। प्रभु ने जग में जो कुछ भेजा, है कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
How a small seed becomes a big tree. How a earthen lump creates waves in water. Whatever creation of God in the world, now I have its value explains. Nothing goes waste here. Yes, nothing goes waste here. Look at the little ant how it tries its best. How a small boat collides with the storms. . Be strong in your determination steadfast, If your determination is strong, then everything is possible. Nothing goes waste here. Yes, nothing goes waste here. How does a stream of water move faster, cutting through even the stones?. See how the drops of water, come together to become the ocean. You learn from the burning lamp, It fights the darkness. Nothing goes waste here. Yes, nothing goes waste. The inanimate and living things in the world, Everyone has their own sovereignty. Never become insignificant on your own accord, The Lord has given you amazing ability. Just like taking a small step, A path Would have skipped. Whatever God has sent into the world, nothing goes waste. Yes nothing goes waste here.
” किसी को भी ख़ुद के कम आंकते हुए उसे उसका उपहास या अपमान करने की भूल ना करें,हो सकता उसमें वह गुण हो जो आपकी क्षमता है परे है। क्योंकि ईश्वर की हर रचना स्वयं में अद्वितीय है।”
“Don’t make the mistake of underestimating or insulting someone; they may have qualities that are beyond your ability. Because every creation of God is unique in itself.”
अकेलेपन का गम उससे ज्यादा और कोई नहीं समझ सकता, जो अपनों के साथ रहने के बावजूद अकेला महसूस करता हो।
बहुत तकलीफ़ होती है जब अपने साथ होते हुए भी बहुत दूर होते हैं।एक अलग सा दर्द महसूस होता है । ऐसा नहीं कि अपने साथ नहीं देते, मगर कोई आपको समझने वाला नहीं होता। ऐसे में तकलीफ़ दुगनी हो जाती है और इस हाल में हम अक्सर गलत फैसले कर बैठते हैं या कोई गलत आदत अपना लेते हैं,अपनी मायूसी को छुपाने के लिए। लेकिन हमारी दिक्कतें कम नहीं होती, बल्कि और भी ज्यादा बढ़ने लगती हैं । इसलिए अगर आप अकेला महसूस करते हैं तो अपनों से इस बारे में बात कीजिए,अपने दोस्तों से मिलिए और खुद को खुश रहने की कोशिश कीजिए। तभी आप अकेलेपन के भॅवर से निकल सकते हैं वरना डूब जायेंगे।
जिसके उर जैसी सोच बसी, अंतर के पट ही खोलेंगे। मीठी-कड़वी सी कुछ बातें, सुननी होंगी जब डोलेंगे। मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे, मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे। मत सोच तेरी असफलता पर, ये लोग व्यंग कर जाते हैं। शायद तुझको है पता नहीं, ये कोशिश से डर जाते हैं। अरे जिसने न कभी कुछ की ठानी, क्या सफल भला हो पायेंगे? जिनको दूजा कोई कर्म नहीं, बस अपना राग बजाएंगे। जीतने भी हैं खाली बर्तन-2 नीचे गिरते ही बोलेंगे। मीठी-कड़वी सी कुछ बातें, सुननी होंगी जब डोलेंगे। मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे, मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे। माना कि है तलवार नहीं पर, कम भी इसका वार नहीं। मन-हृदय चीर बढ़ जाता है, विष बुझे बाण बरसाता है। कभी पुष्पों की वर्षा करता, कभी मन में फांस चुभाता है। कटु शब्द है रोक सका कोई-2 मन में जो विष ही घोलेंगे। मीठी-कड़वी सी कुछ बातें, सुननी होंगी जब डोलेंगे। मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे, मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे। शायद तुमने देखा होगा, कुछ धूप-छांव के रंगो को पल-पल जो वेश बदलते हैं, धरते-तजते हैं संगों को। कभी काग न गाए कोयल सा, विषधर न अमृत दान करे। जो बीज धरा में हो अरोपित, वैसी ही उपज खलिहान करे। ये अटल सत्य जाने फिर भी-2 जड़बुद्धि कहां चुप हो लेंगे। मीठी-कड़वी सी कुछ बातें, सुननी होंगी जब डोलेँगे मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे, मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
“अक्सर लोग किसी न किसी बहाने से औरों को नीचा दिखाने या हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं और अपनी भीतर झाँकते तक नहीं। इसलिए ऐसे लोगों की बातों को नज़रंदाज़ करते हुए अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते रहें। क्योंकि जो आज कह रहे हैं कि तुमसे ना हो पाएगा कल वही तुम्हारी सफलता के गीत गायेंगे और कहेंगे मुझे पता था एक न एक दिन ये ज़रूर कुछ बड़ा करेगा।”
मुस्कुराहट के पर्दे से तकलीफें छुपा रक्खी हैं जनाब, डरता हूं कि मेरी रोती हुई शक्ल कहीं कोई देख न जाए।
पुरुष हमेशा और हर किसी के आगे नहीं रोते और रोते हैं तो समझिए कि तकलीफ़ बर्दाश्त के बाहर है…..।औरतों और बच्चों को तो रोते हुए आपने देखा होगा पर किसी पुरुष को कभी रोते हुए देखा है क्या? कहते हैं मर्द को दर्द नहीं होता और उससे उम्मीद की जाती है कि वो दूसरों की तकलीफ को समझे ऐसा क्यों? जिसे तकलीफ़ नहीं होती भला वो किसी का दर्द क्या समझेगा? पर ऐसा नहीं है।नारियल बाहर से कठोर लेकिन अन्दर से नर्म होता है ये सभी जानते हैं। किसी पुरुष के मन का हाल भी ठीक वैसा ही होता है।या यूं कहें कि बना दिया जाता है। एक प्रसिद्ध वाक्य है मर्द कभी रोते नहीं। अरे ! अगर पुरुष रोना भी चाहे तो रो नहीं सकता क्योंकि लोग उसे जीने नहीं देंगे; उसे ताने मारने लगेंगे। लोग कहेंगे कि ये कमज़ोर दिल का है और कभी-कभी तो पुरुष को स्त्री की भी संज्ञा दी जाती है। हालांकि हमारे समाज में पहले से ही यह छोटी मानसिकता रही है कि स्त्रियां कमज़ोर होती हैं और पुरुष ताकतवर। इसलिए अगर रोना भी हो तो पुरुष को अकेले चुपचाप चोरी से रोना पड़ता है कि कहीं कोई देख ना जाए।आज जब स्त्री सशक्त होती है तो लोग वाह-वाही करते हैं,लेकिन जब कोई मर्द कमज़ोर हो तो लोग उसे जीने नहीं देते ऐसा क्यों? क्या केवल स्त्रियों को ही रोने का हक है पुरुषों को क्यों नहीं?मन और हृदय तो सबका कोमल होता है फ़िर भी हम पुरुष को ही भावनाहीन और कठोर हृदय मान लेते हैं ,क्योंकि वो जल्दी किसी के आगे नहीं रोता? सत्य है कि पुरुष तन से थोड़े कठोर होते हैं किन्तु इसका अर्थ ये नहीं कि उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं होती। स्त्रियां तो अपना दुखड़ा किसी न किसी के आगे रो लेती हैं, पर पुरुष किसके आगे रोए ,किससे अपनी तकलीफ़ कहे? आज तक स्त्रियों को समाज में दबाया जाता रहा है लेकिन लोगों की आंखे धीरे धीरे खुलने लगी है और आज स्त्री; शक्ति के रुप में उभर रही है। किन्तु पुरुष की इस मनोदशा पर आजतक किसी की दृष्टि तक नहीं पड़ी।जब भी पुरुष अपनी तकलीफ किसी से बयां नहीं कर पाता, किसी से कुछ कह नहीं पाता तो अन्दर ही अन्दर घुटने लगता है और जब भावनाओं को दबाया जाता है तो उसकी यह भावनाए ज्यादातर गुस्से व चिड़चिड़ेपन का रुप ले लेती है।तो कभी न कभी, कहीं न कहीं यह ज्वालमुखी फट पड़ता है। यही कारण है कि वो अपनी भड़ास अपने घरवालों, पत्नी और बच्चों पर निकाल देते है,अगर कोई बार-बार उन्हें कुछ पूछता है या कहता है।हालंकि घरेलू हिंसा इस विषय में अनुचित और निन्दनीय है, लेकिन हम यहां पुरुष के डांट-फटकार की बात कर रहे हैं घरेलू हिंसा की नहीं।हम जानते हैं कि समाज का विकास स्त्री या पुरुष में से किसी अकेले के बस की बात नहीं है। इसलिए यदि हमें दोनों को समाज में समान अधिकार व सम्मान दिलाना है तो दोनों की भावनाओ और मनोभावों को समझना पड़ेगा और उनका सम्मान करना पड़ेगा। तभी समाज आगे जाकर विकसित हो पाएगा।
नोट: ऊपर दिए गए विचारों में यदि कोई त्रुटि हो या कुछ गलत कहा गया है ऐसा लगे तो कृपया मुझे क्षमा करें और अपने बहुमूल्य सुझावों और विचारों से मेरा मार्गदर्शन करें। धन्यवाद🙏
अगर जेब में भारीपन और कपड़ो में महंगाई की झलक हो, तो दुनियां कभी ये नहीं पूछती कि ये दौलत कहां से आयी ?
इस दुनिया में पैसे की कीमत इन्सान से ज़्यादा हो गई है।इसके आगे प्यार, मुहब्बत, रिश्ते,नाते सब बे मायने होते जा रहे हैं।आज कल सफ़लता की निशानी बस पैसा हो गया है। बात कड़वी है; मगर सच है कि आजकल लोगों की ज़रूरतें और मानसिकता पैसे से इतनी ज़्यादा जुड़ चुकी है,कि आज मर रहे इंसान की ज़िंदगी के अलावा पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। पैसे और सम्पत्ति के लिए भाई-भाई और दोस्त-दोस्त का दुश्मन बन बैठा है। अगर आप अमीर हैं, आपके पास बेहिसाब पैसा है तो आपसे कोई ये नहीं पूछेगा कि आपके पास इतना सारा पैसा कहां से आया । भले ही वो पैसे आपने किसी गलत रास्ते को अपनाकर ही क्यों न कमाया हो।
जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? हक की खातिर तो लड़ना बनता, पर बांट भला अधिकार कहां। छोटे-मोटे मतभेदों में, प्रतिकार सा निम्न विचार कहां। छोटी मोटी तू-तू-मैं मैं, किस मोड़ भला पहुंचाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। ये सोच सदा सब कुछ बांटे। बांटी धरती-अम्बर-सागर। घर-द्वार-पिता-मां-संबंधी, सबको दो राहे पर लाकर। यह दो शब्दों की रीति भला। अब कौन सा खेल दिखाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? खुद की सोचे से है घटता, धन-धान्य-शक्ति-भाईचारा। सबके सोचे से है बढ़ता, जग में जो कुछ भी है प्यारा। यदि बांटे की मंशा तेरी, तो बांट दया-शांति-समता, दे बांट जो मन में प्रेम भरा, हाँ बांट तू अच्छी सीख सदा। ये सोच ही सच्ची जीवन की, पीढ़ी को राह दिखायेगी। अब बांट लगा सत्कर्मों तेरी झोली भर जाएगी। हाँ बांट लगा तू देर न कर। खुशियां जग में मुस्काएंगी।
“आपसी मतभेदों के कारण हमनें आस पास लकीरें खींच रक्खी हैं । मानवता को बांटने के लिए हमनें जाति,धर्म,भाषा,समाज,देश;सबके टुकड़े कर दिए।किसी को भी नहीं छोड़ा और इसीलिए आज हमें अपने चारों ओर दुश्मन ही दुश्मन दिखाई देती हैं। इस दुश्मनी को अगर ख़त्म करना है तो हमें अपने दिल से इस बंटवारे की भावना का अन्त कर, प्रेम को स्थान देना होगा।”
लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा। कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से। कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है। जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।
पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।
टूट डाल से गिरा धरा पर, इक नन्हा पीपल का पत्ता। खोकर भी अस्तित्व था उसने, धैर्य नहीं तजना सीखा। इतने में बस आंधी आई, वो पहुंच गया खलिहानों में। उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते, वह पहुंच गया वीरानों में। थे जहां न वन था वन ही वन, न जलचर थे, नभचर भी न थे। बस था अजीब सा सन्नाटा, था पहुंच गया उड़ते-गिरते । कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते, मुरझाया जो था हरा भरा। हां किया मृत्यु का स्वागत उसने, जिसने जीवन भर धीर धरा।
मैं दीपक जलना कर्म मेरा। तम हर्ता हूं यह धर्म मेरा। नित जलता मैं बुझ जाता हूं। जीवन संदेश सुनाता हूं। जैसे सूरज व प्रकृति सदा। करते निश्चल हो कर्म सभी। ले नेत्र खोल सुन हे मानव। तज आशाएं है समय अभी। जैसे सत्कर्मों की ख्याति। तोड़े साड़ी सीमाओं को। वैसे ही परहित दूर करे । साड़ी मानव विपदाओं को। यहां जिसने भी जीता बांटा। उससे ज्यादा वो पाएगा। ये पूँजी सच्ची जीवन की। जो ऊपर ले के जाएगा। माना लोगो की सोच बुरी पर। तू भी बुरा तो क्या अन्तर। विश्वास तू कर दिन आएगा । जब जगेगा सबका अंतर। दूजों से उम्मीद जो कर तू परहित करता जाएगा। तो सोच सदा ये कर्म तेरा फिर लेने देंन कहलेगा। विक्रेता नहीं तू मानव है। मानवता बिन कैसा जीवन। बन जा दीपक कर आलोकित। धरती पर फैला ये उपवन।
दूसरों की मदद करने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी देखकर जो सुकून मिलता है उसे बयां नहीं किया जा सकता। अगर वैसा ही सुकून आपको भी महसूस करना हो तो किसी जरूरतमंद की मदद करके ज़रूर देखिएगा।”
सारी सच्चाई तस्वीरें बयां नहीं करती। कुछ अनकहे किस्से छूट जाया करते हैं।
ज़िंदगी का हाल भी तस्वीर के जैसा ही है,कोई कितनी भी कोशिश कर ले; कुछ किस्से अधूरे ही रह जाते हैं। इन्सान को वो सब कुछ नहीं मिल पाता ,जो उसकी ख्वाहिश होती है। भले ही उसने; उसके लिए क्या कुछ न झेला हो। किसी ने सच ही कहा है एक तस्वीर,पूरी ज़िंदगी बयां नहीं कर सकती।..।
महाभारत युद्ध में जब अर्जुन त्रिगर्त नरेश सुशर्मा और उनकी सेना से युद्ध करते हुए युद्धभूमि से अधिक दूर चले जाते हैं।तब आचार्य द्रोण चक्रव्यूह का निर्माण करते हैं जिससे पाण्डवों को युद्ध में हराया जा सके और उनके सहित सम्पूर्ण पाण्डव सेना का नाश किया जा सके। पाण्डवों में किसी को भी चक्रव्यूह का तोड़ पता न होने के कारण वे धर्मसंकट में पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चक्रव्यूह का पूर्ण ज्ञान न होने पर भी अर्जुन पुत्र अभिमन्यु व्यूह में जाने का निर्णय करते हैं। नीचे उसी प्रसंग को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।
गूंज उठे दिग दशों भयंकर, अभिमन्यु की गर्जा से। था विदीर्ण;जिसका लथपथ तन, पैने बाणों की वर्षा से। आयु न थी ना था रण अनुभव, पर पर्वत सम वो खड़ा रहा। कौरव योद्धाओं के सम्मुख, अन्त श्वांस तक अड़ा रहा। है प्रसंग यह कुरुक्षेत्र का, पांडव जन में है असमंजस।-2 कौन करेगा भेदन इसका, गुरु द्वारा निर्मित यह व्यूह विकट। अर्जुन के बिन चक्रव्यूह का, ध्वंस नहीं हो पाएगा। लगता मानो आज धर्म का, शीश अभी झुक जायेगा। इतने में इक ध्वनि गूंजी, हे तात! मैं व्यूह में जाऊंगा।-2 पिता नहीं तो क्या अन्तर, मैं धर्म ध्वजा फहराऊंगा। माना आयु कम है मेरी, अधिक न रण मैंने देखा। किन्तु मातृ के गर्भ में मैंने, चक्रव्यूह भेदन सीखा। कष्ट यही इक मात्र हृदय में, पूर्ण ज्ञान ना ले पाया। अंतिम चक्र का नाश हो कैसे, गूढ़ ज्ञान ना ले पाया। धर्मराज ने रोका चिन्तित हो, पर अभिमन्यु ना माना।-2 जिसको नव अध्याय था लिखना, उसने भय ना पहचाना। और अब……… दृश्य दिखाऊं रणभूमि का, सम्मुख आए दोनों दल। शंखनाद के बाद था छाया, युद्धभूमि में कोलाहल। भाले से भाले टकराये, कहीं तीर पर तीर चले। कहीं गदा ध्वनि कहीं गजगर्जन, कहीं कहीं दिव्यास्त्र चले। अब थी बारी अर्जुन सुत की, चक्रव्यूह में किया प्रवेश।-2 जिसको नव बालक था समझा, योद्धा निकला कुशल विशेष। कौरव योद्धा उस बालक के, बाणों को ना झेल सके। किया जतन अविरत कितनों ने, पर उसको ना अवरोध सके। जहां निकलता था अभिमन्यु, शत्रु विक्षत हो जाते थे। वेगवान बाणों के सम्मुख, तृण-पत्तों सम उड़ जाते थे। जब आया है चक्र सातवां, जिसका भय था वही हुआ।-2 इसका भेदन पता नहीं था, कुरु वीरों ने घेर लिया। जाने कैसे वीर सभी थे, युद्ध धर्म ही छोड़ दिया। सात महारथियों ने मिलकर, उस एक वीर संग युद्ध किया। तीरों से घायल था फिर भी, युद्धभूमि से डिगा नहीं।-2 कुरु महारथियों को अब तक, ऐसा योद्धा मिला नहीं। जब कोई भी पार न पाया, अर्जुन के दुर्जय सुत का। तब छलने की युक्ति लगाई, मोह पाश मेंबांध लिया। बोला जयद्रथ हे अभिमन्यु!, तेरा मेरा कैसा बैर?-2 सगा नहीं पर सम्बन्धी ठहरा, रख दे आयुध इक पल ठैर। बालक ही था चल ना समझा, जैसे ही हथियार धरे। वैसे ही कायर वीरों के, उस पर निर्मम वार हुए। हो विस्मित वो घाव झेलता, खड़ा रहा रणभूमि में-2 सोच रहा बचपन मे मैंने, नाम सुने जिन वीरों के। स्वप्न था मेरा समरांगण में, उनसे दो-दो हांथ करूं। हारूं-जीतूं जो भी कुछ हो, फिर भी यश को प्राप्त करूं। लेकिन कायर वीरों से लड़, अब अपयश ही पाऊंगा। गर जीता भी तो अपने कुल का, मैं कैसे मान बढ़ाऊंगा। सोच रहा था जैसे ही, तब मस्तक पर आघात हुआ। मानो बालक के प्राणों पर, जैसे उल्का पात हुआ। प्राण त्याग कर गिरा धरा पर, अर्जुन का जो प्यारा था। श्री कृष्ण की आंख का तारा, मां का राजदुलारा था। पता हो यदि जय है निश्चित, या अभिमान भुजाओं के बल पर। कोई भी रण में जा उतरे, दिखलाए अपना रण कौशल। पर जब जीत न सम्भव लगती हो, और अटल सत्य ही हो मृत्यु। फिर भी जो सिंह रण में गरजे, वो कहलाता है अभिमन्यु।
देवभूमि अर्थात् देवताओं की भूमि जिसे सम्पूर्ण विश्व भारत के नाम से भी जानता है,क्योंकि यहां सर्वाधिक देवताओं का निवास है।भारत देवभूमि यूं ही नहीं कहलाता इस सम्बंध में कई विषय चर्चित हैं। लेकिन आज हम यहां केवल एक विषय की चर्चा करेंगे -देवीय अवतारों की। अवतार क्या है ?यह बात हर भारतवासी को पता है।ईश्वर आदिकाल से ही समय समय पर मानवता की रक्षा के लिए अपने अंशरूप में धरती पर आते रहे हैं। परन्तु यह अर्धसत्य है।ईश्वरीय अवतारों का उद्देश्य केवल मानवों की रक्षा या फिर उनके कष्टों का निवारण ही नहीं हैं बल्कि उनको यह सीख देना भी है कि मानवता का उद्देश्य क्या है। इन्हीं कारणों से इस धरती पर ईश्वर;मानवीय रूप धारण कर अनेकों कष्ट सहते आए हैं। जिससे हमें यह सीख मिल सके कि पशु हो,दानव हो या फिर मानव;अपने सद्गुणों और धर्म के बल पर कोई भी देवत्व प्राप्त कर सकता है। आदिकाल में जितने भी अवतार हुए चाहे वो श्रीराम हों या श्रीकृष्ण,माता सीता हो या बजरंगबली हनुमान,श्री परशुराम हों या श्री लक्ष्मण या फिर भगवान बुद्ध;सभी ने अपने जीवन में चरित्र,मर्यादा,धर्म और मानवता का पालन करते हुए अनेक कष्ट सहे, जिससे हमें उनके चरित्र से शिक्षा ले सकें। तनिक सोचिए त्रेता में श्रीराम को आवश्यकता ही क्या थी कि उन्हें वन-वन भटकना पड़े और अपनी पत्नि सीता के लिए समुद्र पार करके रावण से लड़ना पड़े। वो चाहते तो अयोध्या का राज्य ग्रहण कर सकते थे और वानरों की सहायता लिए बिना ही एक बाण से रावण का वध कर सकते थे।परंतु नहीं ,उन्होंने जग को यह सन्देश दिया कि माता-पिता की आज्ञा देवताओं के लिए भी सर्वोपरि हैं,भाईयों में आपसी प्रेम और सहयोग की भावना हो तो मानव ;रावण जैसे अपराजेय शत्रु से भी जीत सकता है, नारी को बराबर का स्थान व सम्मान मिलना चाहिए और माता सीता ने सन्देश दिया कि एक नारी को सदैव अपने पति का साथ देना चहिए भले ही वह कितनी भी बुरी दशा में हो। हनुमान जी से निःस्वार्थ भक्ति और आस्था,लक्ष्मण जी से अनन्य भ्रातृप्रेम और सेवाभाव की शिक्षा मिलती है। और द्वापर के श्रीकृष्ण से निश्चल प्रेम,निःस्वार्थ मित्रता के साथ-साथ यह सीख भी मिलती है कि यदि कोई मानव धर्म और नारी सम्मान की रक्षा के लिए खड़ा होता है तो स्वयं ईश्वर भी उसका सारथी बन उसे राह दिखाते हैं। अतः सभी देव अवतारों का उद्देश्य मानव को जीवन में प्रेम,त्याग,धर्म,कर्त्तव्य का महत्व समझाना रहा है।
महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने प्रियजनों और संबंधियों को अपने विरुद्ध खड़ा देख युद्ध से विमुख होकर अपना गाण्डीव रख देते हैं ।तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हुए कहते हैं –
शिथिल भुजायें,शीश झुका,चुपचाप खड़ा क्यों? दृष्टि उठा,कर अवलोकन ये वही स्वजन हैं। की पदधूलि तिलक;मस्तक पर जिनकी तूने, आज उन्हीं को रण में तेरा आमंत्रण है। देखी द्युत सभा में जिनकी थी प्रभुताई, अग्निसुता का चीर छीनते लाज ना आई। जिनके मोह को धार भुजाएँ कंपित तेरी, देख सुनाते समरांगण में वो रण भेरी। मूंक पड़े प्रतिमा सम जो थे शीश नवाए, आज खड़े परकोटे बन हैं सम्मुख आए। मनन करो उस कपट सभा की वो अनदेखी, धर्म निबाह की आड़ में स्त्री की लाज ना रक्खी। तात-गुरु-धर्मज्ञ थे अपना धर्म बचाए, तब तूं भी तो मौन खड़ा था शीश झुकाये। केश पकड़ जब खींच रहा था खल-उत्पाती, चीख रही थी कुल मर्यादा बन बेचारी। पर कैसे मैं चुप रहता रव-क्रंदन सुनकर, आना पड़ा था मुझको फिर योगेश्वर बनकर। अब देख रहा क्या चाप उठा प्रत्यंचा कस ले, शर वर्षा कर आज समूचे नभ को ढक दे। महाकाल बन जा ऐसे की काल भी कांपे, कोई आंख उठा कर किसी स्त्री को ना ताके। एक-एक के शीश गिरा दे रणभूमि में, जैसे तिनके उड़ जाते मदमस्त पवन में। यदि अब भी तूं मूक रहा तो यह भी सुन ले, हर युग होंगे चीरहरण अब तो तू सुध ले…..। यह सब सुन अर्जुन उठकर है धनुष उठाता, फिर बाणों के बादल से अम्बर छा जाता।
नोट: ऊपर दी गई कविता में महाभारत युद्ध के श्री कृष्ण और अर्जुन के सारे प्रसंग को एक छोटी सी रचना में संजोना संभव नहीं था। इसलिए इसका एक अंश मात्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
गिरने से क्यों घबराता है? छोटा बालक भी गिरता है। जलती भट्टी में तपकर ही तो, स्वर्ण से कुंदन बनता है । फल-फूल के बोझे को सहकर, तरुवर भी यश के पात्र बनें। मानव कष्टों को हरकर ही, गंगा भी जग की मातु बने। कालकूट विष को पीकर, शिव महादेव बन जाते हैं। गुरु-मातु-पिता मे श्रद्धा रख राघव, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। यदि बनना है कुछ जीवन में, तो सूरज सा तपना होगा। यश-मान को धारण करना हो, तो कुम्भ सा भी पकना होगा। जिनकी भी ख्याति है जग में, बिन त्याग के कोई नाम नहीं। सच ही कहते है मानव का, संघर्ष बिना सम्मान नहीं।-2
“इन्सान को सफल बनना है तो, मूल्य तो चुकाना पड़ेगा। बिना परिश्रम और त्याग के कोई भी महान नहीं बनता।”
“अपनों से नाराज़ होकर दूर जाने से अच्छा। संग बैठकर मसले सुलझा लिए जाएं। शायद कोई गुंजाईश बची हो इन रिश्तों में।“
“It is better to get angry with loved ones than to go away. The issues should be resolved by sitting together. Maybe there is some scope left in these relationships.”
रिश्तों को तोड़ना बहुत ही आसान है पर निभाना मुश्किल। रिश्ते बने ही हैं एक-दूसरे को संभालने, समझने और बुरे वक्त में एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए। इसलिए जब भी कोई रूठ जाए तो उसे समझा बुझा कर माना लेना चाहिए।
“खुशनसीब हैं वो लोग जिनके पास कोई तो है खयाल रखने को,कुछ बदनसीबों को तो बस ठोकरें ही नसीब होती हैं।”
क्या हुआ जो धीरज टूट गया ? क्या हुआ जो साहस छूट गया ? क्या हुआ जो आँखें भर आईं ? क्या हुआ जो विपदा है छाई ? बिगड़ी है तो बन जाएगी, ख़ुद के मन को समझाए रखना। इन तूफ़ानी अंधियारों में बस, इक आस का दीप जलाए रखना।-2 तिनका-तिनका चुनकर चिड़िया, अपना नीड़ गढ़ा करती है। वर्षा-आंधी को सह-सह कर, मौसम से जूझा करती है। नीड़ बिखरने पर वो फ़िर से, अपना नीड़ दोबारा गढ़ती। सोचो पंछी भी हार न मानें, मानव की लाज बचाए रखना। इन तूफ़ानी अंधियारों में बस, इक आस का दीप जलाए रखना।-2 काले-काले मेघ गगन में, चारों ओर भ्रमण करते हैं। कहीं गरजते-कहीं बरसते, कहीं धरा सूखी रखते हैं। बिन वर्षा के कृषक भी अपने, खेतों को जोता करता है। एक कृषक की भांति ही तुम भी, ख़ुद का मन बहलाए रखना। इन तूफ़ानी अंधियारों में बस, इक आस का दीप जलाए रखना।-2 दिन ढलता है,रात निकलती, चहुँ ओर अंधेरा छाता है। सूरज अपनी बारी तकता, मन ही मन मुसकाता है। चाहे बादल और ग्रहण हो, सूरज अपनी हार न माने। हर दिन अंधियारे को चीरे, लेकर भोर निकलता है। अपने मन में ऐसे ही तुम, सूर्य सी चमक जगाए रखना। इन तूफ़ानी अंधियारों में बस, इक आस का दीप जलाए रखना।-2
“कहते हैं दुनिया उम्मीद पर ही कायम है;जिसने उम्मीद छोड़ दी,उसने जीना छोड़ दिया। इसलिए अपने लिए ना सही; दूसरों के लिए ही उम्मीद के हांथ को थामे रक्खे। क्या पता आप किसी की उम्मीद, किसी प्रेरणा हो और नहीं हैं तो क्या पता बन जाएं।”
कुछ कही सुनी सी बातें हैं, कुछ कहे सुने से किस्से हैं। दिल में कुछ- कुछ है खालीपन, धुंधली यादों के हिस्से हैं। कुछ खुशियों की किलकारी है। कुछ रोते बचपन के मुखड़े। कुछ पल जो बीते अपनों संग। कुछ-कुछ टूटे दिल के टुकड़े। पर बीती यादों से फ़र्क किसे? जब टूटे-बिखरे रिश्ते हैं। कुछ कही सुनी सी बातें हैं, कुछ कहे सुने से किस्से हैं। दिल में कुछ-कुछ है खालीपन, धुंधली यादों के हिस्से हैं। ये वक्त ये पल बस दो दिन के। गुजरे जब भी क्या लौटेंगे? है आज भी जो कल शायद न हो। दिल से दिल को कब जोड़ेंगे। मन में छाई जो कड़वाहट, बातें भी घर कर लेते हैं। रिश्तों की नाज़ुक धागे को, गांठों से फिर भर देती है। है हाथ वही जो कुछ लगना, जिसके किस्मत जो हिस्से हैं। कुछ कही सुनी सी बातें हैं, कुछ के लिए से किस्से हैं। दिल में कुछ- कुछ है खालीपन, धुंधली यादों के हिस्से हैं।
Some things are heard somewhere, Some are stories from hearsay. There is some emptiness in the heart, There are parts of hazy memories. Some shout of happiness. Some crying childhood faces. Some moments spent with loved ones. Pieces of a broken heart. But who cares about past memories? When there are broken relationships. Some things are heard somewhere, Some are stories from hearsay. There is some emptiness in the heart, There are parts of hazy memories. This time, this moment is just for two days. Even after this passes, What will they return? It is there today which may not be there tomorrow. When will you connect heart to heart? Whenever bitterness fills the heart, Things also make a home in the heart. To the delicate thread of relationships, Fills again with knots. Whatever you feel in your hand, Whose fate is a part. Some things are heard somewhere, For some there are tales. There is some emptiness in the heart, There are parts of hazy memories.
“इस दुनिया में हर चीज़ की कीमत चुकानी पड़ती है। अच्छाई की भी और बुराई की भी। फ़र्क बस इतना सा है कि अच्छाई ये क़ीमत पहले और बुराई बाद में चुकाती है,पर हिसाब सबका होता है। इसलिए बुद्धिमानी से चुनाव करें।”
“There is price to be paid for everything in this world; For Goodness as well as badness. The only difference is that the good pays this price first and the evil later, but everyone is accounted for. So choose wisely.”
वक्त बदलते देखा है हालात बदलते देखे हैं। इस मोल भाव की दुनिया में, जज़्बात बदलते देखे है। मैंने देखा है लोगों की, एक पल में सोच बदल जाना। हां देखा मैंने अपनों का, मतलब के बाद मुकर जाना। देखा मैंने परछाई का, सूरज सर चढ़ते ही छुप जाना। देखे धोका देने वाले, देखा है उनका मुस्काना। मैंने देखा है अपने ही, रिश्तों को नंगा करते हैं। मैंने देखा है यारों का, मतलब के संग निकल जाना। हां देखा रिश्तों का जुड़ना, देखा लोगों का पछताना। सब देखा मैंने लोग कई, गिरगिट बन रंग बदलते हैं। हां वक्त हमें समझाता है, सब वक्त पे संग बदलते हैं।
I have seen the time changing. I have seen the time changing. I have seen the situation changing. In this world of bargains,we have seen the changing of emotions. I have seen people’s thinking change in a moment. Yes,I have seen my loved ones turn away after meaning. I saw the shadow of the sun disappear as soon as it rises. See those who cheat, have seen their smile. I have seen that they strip their own relationships. I have seen that the meaning of friends is to leave with them. Yes,saw the connection of relationships, saw the repentance of people. I have seen, many people change their behavior with others according to their benefit & situation like chameleon. Yes,Time teaches us,everyone changes company at times.
“दूसरों के साथ की उम्मीद हद तक और दूसरों का साथ अपने मतलब तक ?”
“Why do we expect others to support us till the end, when it is our turn to support them only till our selfishness is met”
यह उस समय की बात है जब विश्व में कोविड -19 का आतंक फैला हुआ था और मुझे अपने मित्र के यहां महीने भर रुका हुआ था। उस समय मैंने यह कविता लिखी थी –
घर-घर में आतंक मचा है सारे जन हैं अकुलाये। आई विपदा घोर भयंकर प्रान्त-राष्ट्र सब घबराए। फैली ये महमारी कैसी नित चिन्तित भय कम्पित सब? मुक्ति भला संभव हो कैसे सभी जन है यदि क्षत-विक्षत? राह चले जो भिन्न स्थानों से भिन्न स्थानों पर जाने को। यात्रा कैसे पूर्ण करेंगे पास नहीं कुछ कुछ खाने को। कोई क्षुधित है कोई थकित है कंठ सभी के सूखे रहे। पर निज गृह की आस न छूटे धीरे सब के टूट रहे। देख दशा ये दिन जाने के अश्रु नेत्रों से छलक पड़ा। मानवता पर घोर विपत्ति हृदय-विदारक दृश्य बड़ा। अटल सत्य है समय विकट है विश्व दशा अति दुर्दर है। नहीं स्थिति का भान किसी को महाविपत्ति घर-2 है। विनय निवेदन सभी जनों से जहां उपस्थित रुके रहें। स्वयं पूर्व अपनों की सोचें सदा रहे वो धीर धरें। मानवता की दौड़ में जो भी रो-थक संयम छोड़ गया। फिर समझो मानवता हारी जीवन भी मुख मोड़ गया। अपना जीवन सबका जीवन अपने-2 हाथों में। समय नहीं जो व्यर्थ करे हम वाद-विवाद की बातें में। प्रथम सुरक्षा-अंत सुरक्षा ध्येय सुरक्षा जन-2 की। चेत समय फिर निकल न जाए आस यदि है जीवन की। दूर रहो व स्वच्छ रहो खुद शासन का सहयोग करो। स्वयं-स्वजन वा राष्ट्र हेतु गृह बंधन को स्वीकार करो।
It was about that time when the terror of Covid-19 was spread in the world and I had to stay at my friend’s place for a month.that time i wrote this poem. There is panic in every house, everyone is scared.
The calamity came, all the provinces and nations were terrified. How this epidemic has spread, everyone is constantly worried and trembling? How can liberation be possible if all the people are mangled in pendemic? Walk the path that goes from different places to different places. How will they complete the journey,When there’s nothing to eat? Some are hungry, some are tired, may everyone’s throat be dry. But the hope of one’s own home should not be lost, everyone’s patience slowly breaking. Seeing this condition of the poor people, tears welled up in my eyes. Humanity has been hit by a catastrophe, what a heart-wrenching scene. The time is critical, the world condition is very bad. No one is aware of the situation, there is a great calamity in house to house. Humble request to all the people where present stayed. Always be thinking of your own people before yourself, may they be patient. In The race of humanity, whosoever weary has left restraint. Then understand that humanity has lost its life too. Your life, everyone’s life in your hands. We don’t have time to waste in debates. First security-end security goal security of evey people. If you hope to live life then be careful lest time slips out of hand. Stay away and stay clean, cooperate with the government yourself. Accept the home bondage & will be corentine for self-relatives or nation.