दूसरा मार भी डाले तो कोई ग़म नही, पर अपनों के दिए घाव बर्दाश्त नहीं होते….।

अपनों का मारा हुआ इन्सान खुद ही मर जाता है, किसी और को ये ज़हमत उठाने ही ज़रूरत नहीं पड़ती।
दूसरा मार भी डाले तो कोई ग़म नही, पर अपनों के दिए घाव बर्दाश्त नहीं होते….।

अपनों का मारा हुआ इन्सान खुद ही मर जाता है, किसी और को ये ज़हमत उठाने ही ज़रूरत नहीं पड़ती।
वाह वाह, क्या बात है।
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आपके शब्द सदैव मेरा उत्साह बढ़ाते हैं।🙏
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