टूट डाल से गिरा धरा पर,
इक नन्हा पीपल का पत्ता।
खोकर भी अस्तित्व था उसने,
धैर्य नहीं तजना सीखा।
इतने में बस आंधी आई,
वो पहुंच गया खलिहानों में।
उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते,
वह पहुंच गया वीरानों में।
थे जहां न वन था वन ही वन,
न जलचर थे, नभचर भी न थे।
बस था अजीब सा सन्नाटा,
था पहुंच गया उड़ते-गिरते ।
कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते,
मुरझाया जो था हरा भरा।
हां किया मृत्यु का स्वागत उसने,
जिसने जीवन भर धीर धरा।


