कड़वा सच(Bitter truth)

सोशल मीडिया पर लोगों का दर्द देखकर आंखों में आंसुओं की बाढ़ सी आ जाती है।पर न जाने क्यों खुद के घर मे तड़प रहे मां-बाप किसी को नज़र ही नहीं आते।फ़र्क बस नज़रों का नहीं नज़रिए का है।

Seeing the pain of people on social media, tears well up in the eyes. But don’t know why no one can see the parents who are suffering in their own house. The difference is not just in the eyes but in the attitude.

संघर्ष (Struggle)

गिरने से क्यों घबराता है?
छोटा बालक भी गिरता है।
जलती भट्टी में तपकर ही तो,
स्वर्ण से कुंदन बनता है ।
फल-फूल के बोझे को सहकर,
तरुवर भी यश के पात्र बनें।
मानव कष्टों को हरकर ही,
गंगा भी जग की मातु बने।
कालकूट विष को पीकर,
शिव महादेव बन जाते हैं।
गुरु-मातु-पिता मे श्रद्धा रख राघव,
मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
यदि बनना है कुछ जीवन में,
तो सूरज सा तपना होगा।
यश-मान को धारण करना हो,
तो कुम्भ सा भी पकना होगा।
जिनकी भी ख्याति है जग में,
बिन त्याग के कोई नाम नहीं।
सच ही कहते है मानव का,
संघर्ष बिना सम्मान नहीं।-2

“इन्सान को सफल बनना है तो, मूल्य तो चुकाना पड़ेगा। बिना परिश्रम और त्याग के कोई भी महान नहीं बनता।”

पथ के साथी(Fellow travelers)

जीवन का गंतव्य ढूंढने,
चला पथिक मैं अभिलाषी।
पथ पर चलकर सत्य ये जाना,
कोई नहीं पथ का साथी।
हुई घोर निराशा टूटी-आशा,
तब सहसा ही यह जाना।
लक्ष्य मेरा जीवन मेरा है,
मैं ही खुद का संगाती (साथी)।
सबके अपने स्वार्थ जुड़े हैं,
रिश्ते और जज़्बातों में।
तू मेरा है;मैं तेरा,
ये शब्द जुड़े आभासों से।
सोचो ना आशाएं होती,
तो बोलो फिर क्या होता?
होते सब जंगल के वासी(पशु समान),
या होते सब संन्यासी।
प्रेम-त्याग कलयुग में दिखता,
बस पुस्तक और बातें में।
मैं जानूं और सब ये जाने,
है स्वार्थ जुड़ा सब नातों से।
सत्संग और उपदेश व्‍यर्थ है,
अगर ये बात नहीं समझी।
मतलब के हैं रिश्ते-नाते,
मतलब की दुनियादारी।
सबकी अपनी-अपनी जरूरत,
सबके अपने-अपने बोल।
प्रेम के बदले प्रेम न मिलता,
रिश्ते हैं माटी के मोल।
सबके मुख पर एक मुखौटा,
जब उतरे तो भेद खुले।
समय बुरा हो जब भी अपना,
रिश्ता कौन निभाता है?
निश्चल प्रेम तो माता करती,
चाहे जो-जैसे हो तुम।
पर है पिता का स्थान नहीं कम,
जो पालन करते हर दम।
जिसने भी है सत्य ये,
जन मानव वो सच्चा ज्ञानी।
स्वार्थ रहित जो प्रेम साध ले,
होवे सबका विश्वासी।
जीवन के इस दुर्गम पथ पर,
चलते-चलते अब जाना।
जो देगा वो ही पायेगा,
कठिन नहीं है समझाना।
दूजों से चाहो जो कुछ भी,
पहले पहल तुझे करनी।
यदि सब सबका मुख लगे देखने,
बाद पड़ेगी पछतानी।

समय-समय की बात है बंधु,
समय बड़ा बलधारी है।
कभी मित्र सा परम हितैशी,
कभी ये अत्याचारी है।
सच ही कहा है बड़े जनों ने,
समय ही;समय पर बतलाता।
कौन यहां पर कितना अपना,
कितना कौन पराया है।

“मां-बाप के सिवा इस दुनिया में मुश्किल से ही ऐसे रिश्ते मिलना मुमकिन है जो आपसे सच्चा प्रेम करते हों।”