हैं भले रोशन अंधेरे ,
छाए हैं बादल घनेरे।
छुप गया सूरज ग्रहण है,
धुंध है गायब डगर है।
कर जो हिम्मत तू चला चल,
पाएगा खुशियों का मेला।
कौन कहता तू अकेला?
कौन कहता तू अकेला?
सरसरी चलती हवाएं ,
कान में कुछ कह रही हैं।
राह की पसरी ये चुप्पी,
धड़कनों में बह रही है।
सोचता गर हार की तू,
देख फिर दीपक की लौ को।
है अकेली आखरी दम तक,
तिमिर से लड़ रही है।
लौ सा एक अहसास बन,
जा दूर कर जो है अँधेरा।
कौन कहता तू अकेला?
कौन कहता तू अकेला?
धूप है तो छांव भी है,
तेरे घायल पांव भी हैं।
झुरमुटों की आड़ में,
कोई लगाये दाव भी है।
हत जा या हाथियार बन जा,
काट दे डर का ये पहरा।
कौन कहता तू अकेला?
कौन कहता तू अकेला?
गम है क्या ना साथ कोई,
है क्या बड़ी ये बात कोई?
बेफ़िक्र तू दौड़ सकता,
अब से जगा अहसास ये ही।
छू बुलंदी के शिखर,
गोते लगा सागर हो जितना भी गहरा।
कौन कहता तू अकेला?
कौन कहता तू अकेला?

“अकेलेपन से निराश न हों इसे अवसर की तरह समझें जो आपको; खुद को समझने और अपनी खूबियों को पहचानने में मदद करता है।”


