क्या हुआ जो धीरज टूट गया ?
क्या हुआ जो साहस छूट गया ?
क्या हुआ जो आँखें भर आईं ?
क्या हुआ जो विपदा है छाई ?
बिगड़ी है तो बन जाएगी,
ख़ुद के मन को समझाए रखना।
इन तूफ़ानी अंधियारों में बस,
इक आस का दीप जलाए रखना।-2
तिनका-तिनका चुनकर चिड़िया,
अपना नीड़ गढ़ा करती है।
वर्षा-आंधी को सह-सह कर,
मौसम से जूझा करती है।
नीड़ बिखरने पर वो फ़िर से,
अपना नीड़ दोबारा गढ़ती।
सोचो पंछी भी हार न मानें,
मानव की लाज बचाए रखना।
इन तूफ़ानी अंधियारों में बस,
इक आस का दीप जलाए रखना।-2
काले-काले मेघ गगन में,
चारों ओर भ्रमण करते हैं।
कहीं गरजते-कहीं बरसते,
कहीं धरा सूखी रखते हैं।
बिन वर्षा के कृषक भी अपने,
खेतों को जोता करता है।
एक कृषक की भांति ही तुम भी,
ख़ुद का मन बहलाए रखना।
इन तूफ़ानी अंधियारों में बस,
इक आस का दीप जलाए रखना।-2
दिन ढलता है,रात निकलती,
चहुँ ओर अंधेरा छाता है।
सूरज अपनी बारी तकता,
मन ही मन मुसकाता है।
चाहे बादल और ग्रहण हो,
सूरज अपनी हार न माने।
हर दिन अंधियारे को चीरे,
लेकर भोर निकलता है।
अपने मन में ऐसे ही तुम,
सूर्य सी चमक जगाए रखना।
इन तूफ़ानी अंधियारों में बस,
इक आस का दीप जलाए रखना।-2


“कहते हैं दुनिया उम्मीद पर ही कायम है;जिसने उम्मीद छोड़ दी,उसने जीना छोड़ दिया। इसलिए अपने लिए ना सही; दूसरों के लिए ही उम्मीद के हांथ को थामे रक्खे। क्या पता आप किसी की उम्मीद, किसी प्रेरणा हो और नहीं हैं तो क्या पता बन जाएं।”






