टूट डाल से गिरा धरा पर, इक नन्हा पीपल का पत्ता। खोकर भी अस्तित्व था उसने, धैर्य नहीं तजना सीखा। इतने में बस आंधी आई, वो पहुंच गया खलिहानों में। उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते, वह पहुंच गया वीरानों में। थे जहां न वन था वन ही वन, न जलचर थे, नभचर भी न थे। बस था अजीब सा सन्नाटा, था पहुंच गया उड़ते-गिरते । कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते, मुरझाया जो था हरा भरा। हां किया मृत्यु का स्वागत उसने, जिसने जीवन भर धीर धरा।
गगन-धरा को एक करे जो, मरू;सागर से भर लाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं । शब्दों को लय में जो गूंथे, भावों का जो सार भरे। जीवन को प्रकृति से जोड़े, मानव मन की सृष्टि करे। शोक के सागर में डूबे की, तत्क्षण हरती विपदायें। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं। राजसभा या रंगमंच, या युद्धक्षेत्र की रणभेरी। परमप्रभु का भक्तिनाद, या निर्धन जन की हो डेरी। प्रतिक्षण-प्रतिपल स्थिति विशेष में, भिन्न भिन्न यह रूप धरे। मानव मन में शौर्य,प्रेम और भक्ति का संचार करे। रण का भीषण दृश्य दिखाए, हरि दर्शन भी करवाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं । कई रसों से व्याप्त काव्य, यह शिव ताण्डव कहलाता है। कभी वीर रस में डूबा, महाराणा प्रताप बन जाता है। भक्ति रस से सराबोर हो, ये तुलसी-मीरा-सूर बने। कभी कृष्ण के प्रेम में डूबा, राधा का यह रूप धरे। कभी धरे श्रृंगार रूप तो, सिया-राम बन जाता है। कभी कथाओं का माध्यम ले, रामायण भी कहलाता है। पग-पग,नव-नव वेष ये धारे, जन जीवन को सिखलाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं ।
कविताओं और कहानियों का हमारे जीवन में सदैव से ही विशेष स्थान रहा है। चाहे वो बचपन में दादा-दादी से सुनी हुई कहानियां हों या किताबों में छपी हुई कविताएं। ये कवियों और लेखकों की रचनाएं ही तो हैं, जो हमारे मन को कल्पनाओं और भावनाओं से भर देती हैं। इन्हें पढ़ते ही हमारा मन कल्पनाओं से सागर में गोते लगाना शुरू कर देता है। ये कल्पनाओं के साथ साथ जीवन की वास्तविकताओं से तो हमारा परिचय कराती ही हैं।साथ ही साथ हमारे भीतर प्रेम, उत्साह,साहस,भक्ति आदि भावनाओं को जगाते हुए हमारा मार्गदर्शन भी करती हैं।