मुंह की कोई सुनता है क्या?(Does anyone listen to the mouth?)

पतझड़ के पत्तों सा टूटा ,
गिरा कहीं कुछ खुद मुझमें।
अपनी कुछ उम्मीदें टूटी,
संग-संग टूटे कुछ सपने।
तिनका-तिनका बना घरौंदा,
उजड़ा बिखरा राहों में।
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
कुछ दिन-कुछ पल या कुछ बातें,
थी चाह मेरी कोई सुनता।
पर दूजे की परवाह किसे?
है कौन यहां कुछ भी गुनता?
बस मतलब की यहां यारी है,
और मतलब की दुनियादारी।
सब मतलब पर ही याद करें,
सब मतलब पर परवाह करें।
कितने घाव लगे इस दिल पर,
देकर कोई गिनता है क्या?
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
हर बार सोचकर कोशिश की,
हर बार उम्मीदें करता हूं।
है पता मुझे है बेमतलब,
फिर भी तकलीफे चुनता हूं।
जिन्हें खुद से ही लेना देना,
उनको रिश्तों की कहां पड़ी?
बस अपनी झोली भरने तक,
रिश्तों का साथ निभाते हैं।
किसकोअपने ज़ख्म दिखाएं ?
मरहम भी कोई रखता है क्या?
दिल का दर्द दिखेगा किसको?
मुंह की कोई सुनता है क्या?
मुंह की कोई सुनता है क्या?

दर्द(Pain)

कोई तकलीफ़ में हो तो, इकट्ठी भीड़ होती है
मगर बेगाने जख्मों का, कोई मरहम नहीं बनता।
वो दिन कुछ और थे अश्कों को देखा, अश्क जा निकले।
पर अब किसी का दर्द;दूजे की दवा का काम करती है।
कोई तकलीफ़ में हो तो इकट्ठी भीड़ होती है
मगर बेगाने जख्मों का कोई मरहम नहीं बनता
….।

हमारी ये आदत हो गई है की जब भी कोई तकलीफ़ में होता है तो हम तमाशा देखने चले जाते हैं। लेकिन कभी भी उसकी तकलीफ कम करने के बारे में सोचते तक नहीं। कभी-कभी तो हद ही हो जाती है, उदाहरण के लिए -अगर कोई सड़क पर मदद के लिए गिड़गिड़ा रहा हो या कोई अपंग जो ठीक से चल भी न पा रहा हो, को देखकर हंसने या उपहास करने लगते हैं। मदद तो दूर की बात है हम उससे सहानुभूति तक नहीं रखते। आजकल मानवता कहीं खोती जा रही है। हम चाहते तो हैं कि कोई हमारे बुरे समय में हमारी मदद करे लेकिन जब बारी हमारी होती है तो हम पीछे हट जाते हैं।

घाव(Wound)

दूसरा मार भी डाले तो कोई ग़म नही, पर अपनों के दिए घाव बर्दाश्त नहीं होते….।

अपनों का मारा हुआ इन्सान खुद ही मर जाता है, किसी और को ये ज़हमत उठाने ही ज़रूरत नहीं पड़ती।