क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब दूर दराज़ कहीं खुले वातावरण में खासकर शादी या त्योहारों में जब भी कहीं कोई गाना बज रहा होता है तो हम भी जाने अनजाने में वही धुन या गीत गुनगुनाने लगते हैं।ये तो सभी जानते है कि ध्वनि एक तरंग ऊर्जा है और इसे प्रसारित होने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ध्वनि भी सकारात्मक और नकारात्मक प्रकृति की होती है। मैं कोई विशेषज्ञ तो नहीं लेकिन ध्वनि भी भावनाओं से प्रभावित होती है।जब भी आप कोई भूतिया मूवी देखने जाते हो तो आप जो बैकग्राउंड म्यूजिक सुनते हो या कोई दर्द भरा गीत सुनते हो तो उसमें एक नकारात्मक ऊर्जा होती है जो आपके मन-मस्तिष्क को प्रभावित करती है।ठीक जैसे जब हम मन्दिर जाते हैं या अपने पूजा घर में शंख और घंटियों की ध्वनि सुनते हैं तो मन को एक अलग सी शान्ति मिलती है। उदाहरण के लिए अगर बांसुरी की ही बात की जाय तो उससे उत्पन्न ध्वनि सुनकर हमारा मन सुख भी अनुभव कर सकता है और दुःख में डूब भी सकता है। कहने का मतलब ये है कि जैसे बांसुरी की ध्वनि किसी वादक की भावनाओ से प्रभावित होती है ठीक उसी प्रकार हम भी ध्वनि की प्रकृति से प्रभावित होते हैं। यदि ध्वनि सकारात्मक है तो हम प्रसन्न और यदि नकारात्मक है तो हम दुख का अनुभव करते है।यही बात हमारे द्वारा कहे जाने वाले शब्दों पर भी निर्भर है। यदि हम किसी को नकारात्मक वाणी बोलते है तो उस व्यक्ति का मन दुखी होता है या उसके मन में दुर्भावना उत्पन्न होती है और जब हम किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देते हैं या उससे अच्छी बातें करते हैं तो वह प्रसन्न हो जाता है। अतः ध्वनि भी सकारात्मक और नकारात्मक प्रकृति की होती है हमारे विचारों और भावनाओं को प्रभावित करती है।

