लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा। कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से। कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है। जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।
पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।
टूट डाल से गिरा धरा पर, इक नन्हा पीपल का पत्ता। खोकर भी अस्तित्व था उसने, धैर्य नहीं तजना सीखा। इतने में बस आंधी आई, वो पहुंच गया खलिहानों में। उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते, वह पहुंच गया वीरानों में। थे जहां न वन था वन ही वन, न जलचर थे, नभचर भी न थे। बस था अजीब सा सन्नाटा, था पहुंच गया उड़ते-गिरते । कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते, मुरझाया जो था हरा भरा। हां किया मृत्यु का स्वागत उसने, जिसने जीवन भर धीर धरा।
माला बनने के लिए फूलों को एक साथ जुड़ना ज़रूरी होता है।अगर फूल अकेला हो तो भगवान उसे केवल अपने चरणों में ही स्थान देते हैं। जबकि वो उस माला को गले से लगाते हैं,जो फूलों की एकता और प्रेम का प्रतीक है,किसी अकेले फूल के अहंकार का नहीं।ठीक उसी प्रकार यदि हम सभी भारतीय ये चाहते हैं,कि विश्व हमें सम्मान की दृष्टि से देखे ;तो हमें मिलकर एक होना होगा। क्योंकि लड़ाई अगर घर में हो तो फ़ायदा हमेशा कोई तीसरा ही उठा ले जाता है। इसलिए सभी वाद और मतभेदों को भुलाकर हमें एक नई शुरुआत करनी होगी।
मैं दीपक जलना कर्म मेरा। तम हर्ता हूं यह धर्म मेरा। नित जलता मैं बुझ जाता हूं। जीवन संदेश सुनाता हूं। जैसे सूरज व प्रकृति सदा। करते निश्चल हो कर्म सभी। ले नेत्र खोल सुन हे मानव। तज आशाएं है समय अभी। जैसे सत्कर्मों की ख्याति। तोड़े साड़ी सीमाओं को। वैसे ही परहित दूर करे । साड़ी मानव विपदाओं को। यहां जिसने भी जीता बांटा। उससे ज्यादा वो पाएगा। ये पूँजी सच्ची जीवन की। जो ऊपर ले के जाएगा। माना लोगो की सोच बुरी पर। तू भी बुरा तो क्या अन्तर। विश्वास तू कर दिन आएगा । जब जगेगा सबका अंतर। दूजों से उम्मीद जो कर तू परहित करता जाएगा। तो सोच सदा ये कर्म तेरा फिर लेने देंन कहलेगा। विक्रेता नहीं तू मानव है। मानवता बिन कैसा जीवन। बन जा दीपक कर आलोकित। धरती पर फैला ये उपवन।
दूसरों की मदद करने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी देखकर जो सुकून मिलता है उसे बयां नहीं किया जा सकता। अगर वैसा ही सुकून आपको भी महसूस करना हो तो किसी जरूरतमंद की मदद करके ज़रूर देखिएगा।”
हैं भले रोशन अंधेरे , छाए हैं बादल घनेरे। छुप गया सूरज ग्रहण है, धुंध है गायब डगर है। कर जो हिम्मत तू चला चल, पाएगा खुशियों का मेला। कौन कहता तू अकेला? कौन कहता तू अकेला? सरसरी चलती हवाएं , कान में कुछ कह रही हैं। राह की पसरी ये चुप्पी, धड़कनों में बह रही है। सोचता गर हार की तू, देख फिर दीपक की लौ को। है अकेली आखरी दम तक, तिमिर से लड़ रही है। लौ सा एक अहसास बन, जा दूर कर जो है अँधेरा। कौन कहता तू अकेला? कौन कहता तू अकेला? धूप है तो छांव भी है, तेरे घायल पांव भी हैं। झुरमुटों की आड़ में, कोई लगाये दाव भी है। हत जा या हाथियार बन जा, काट दे डर का ये पहरा। कौन कहता तू अकेला? कौन कहता तू अकेला? गम है क्या ना साथ कोई, है क्या बड़ी ये बात कोई? बेफ़िक्र तू दौड़ सकता, अब से जगा अहसास ये ही। छू बुलंदी के शिखर, गोते लगा सागर हो जितना भी गहरा। कौन कहता तू अकेला? कौन कहता तू अकेला?
“अकेलेपन से निराश न हों इसे अवसर की तरह समझें जो आपको; खुद को समझने और अपनी खूबियों को पहचानने में मदद करता है।”
ऐ भारत के वीर सपूतों! विजय पताका फहराओ। उठो करो संधान लक्ष्य का, बिना रुके चल जाओ। सन्देह नहीं कि मार्ग है दुष्कर, पर खिलता है पंक(कीचड़ )में पुष्कर रत्नाकर-वन-नभ-पर्वत-जन, आज सभी को बतलाओ। ऐ भारत के वीर सपूतों! विजय पताका फहराओ। विपिनचंद्र-आज़ाद-भगत, सावरकर ने बलिदान किया। गांधी-सुभाष-पंडित-पटेल, सबने आधार प्रदान किया। इनकी अभिमानी गौरव गाथा, जीवन भर गाते जाओ। ऐ भारत के वीर सपूतों! विजय पताका फहराओ। जन्मभूमि यह दशरथ सुत की, जिन्होंने जन कल्याण किया। पितृ वचन के मान हेतु, दुर्जन वन को प्रस्थान किया। राम राज्य विस्तार करेंगे, अब संकल्प करे आओ। ऐ भारत के वीर सपूतों! विजय पताका फहराओ।
O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Get up, hit the target, Move on without stopping. There is no doubt that the path is difficult. But the lotus blooms in the mud. Sea-Forest-Sky-Mountain, And People tell everyone today. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Vipinchandra-Azad-Bhagat Singh And Savarkar are sacrificed. Gandhi-Subhash-Pandit-Patel, All provided the base. Keep singing his pride saga, For the rest of your life. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory. This is the birthplace of Dashrath’sson (Lord Rama), Who did public welfare. For the honor of father’s promise, He left his home and went to the fearsome forest. Let’s make a resolution that, We will expand the kingdom of Lord Rama. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory.
संपत्ति के बांटे धन घटे। बन्धु बंटे बल जाय । भेद के बांटे मान घटे। प्रेम बंटे सब जाय। धर्म के बांटे ईश बंटे। जाति बंटे मत जाय। और राष्ट्र के बांटे प्रगति घटे। परवश(पराधीन) होत सहाय। –उमेश कुमार मिश्र
“बैसाखियाँ अगर मुक़द्दर न हों तो मुसाफिर को सहारे दूर तक नहीं ले जा सकते । मंज़िल की चाह रखने वालों को अपने रास्ते खुद ही तय करने पड़ते हैं।”
“If the crutches are not destined, then they cannot take the traveler far with their support. Those who want to reach their destination have to decide their own path.”
ना डर तू उठ महारथी चुनौतियां पुकारती। यहां न कृष्ण-पार्थ हैं स्वयं ही है तू सारथी। विपत्तीयों के अंध को तू चीरता प्रकाश है। है संशयों का स्थान क्या तू ही स्वयं विश्वास है। हो भय भले सफल न हो विफल भी हो तो दुख नहीं। जो हुए महान हैं प्रथम कोई सफल नहीं। है कर्म तेरे हाथ में प्रयास कर प्रयास कर। कि लक्ष्य प्राप्ति ध्येय हो न और कुछ विचार कर। समय-2 की बात है तेरा कभी मेरा कभी। ये गूढ़ तथ्य ज्ञान का भला किसे पता नहीं। जीवन यह है युद्ध क्षेत्र व कर्म अस्त्र-शस्त्र हैं। विचारता है क्यों भला यही तो मूल मंत्र है। भले सगे हों या कोई;तेरा कोई सगा नहीं। विपत्तियों के होड़ में तू एक संग कोई नहीं। राह तेरी है कठिन व सामने पहाड़ है। तू भय न खा कदम बढ़ा गगन सा तू विशाल है। ना धीर तज निराश हो थका नहीं तू हारकर। हां वीर है सशस्त्र तूं कि लक्ष्य पर प्रहार कर।
यह कविता मेरे जीवन की सच्ची घटना पर आधारित है। कोविड-19 महामारी का समय चल रहा था, उस समय लॉकडाउन से ठीक पहले मैं घर के लिए निकला, लेकिन बीच में ही फंस गया. और मुझे अपने एक मित्र के यहाँ एक महीने तक रहना पड़ा, उस समय मेरे मन में जो भावनाएँ थीं, उन्हें मैंने कागज़ पर उतार दिया था और अब उसे आपके सामने रख रहा हूं-
राह के भटके हुए को राह की पहचान क्या, सैकड़ों की भीड़ में भी हमसफ़र कोई नहीं। आशियाना छोड़कर यूं राह में निकले थे हम। एक पल मुड़कर जो देखा थी डगर कोई नहीं। बात पहले कुछ दिनों की चार थे हम चल दिए। मीलों का लंबा सफर था; थी खुशी अब बढ़ चले। पास फिर मंजिल के आकार आंख अपनी जब खुली। रास्ते का ना ठिकाना मंज़िलें कोई नहीं। राह के भटके हुए को राह की पहचान क्या, सैकड़ों की भीड़ में भी हमसफ़र कोई नहीं। सोचकर कुछ रुक गया था थम गया है ये सफ़र। वक्त का ऐसा असर है जिंदगी है बेअसर। शाख के पत्तों के जैसे हौसला है टूटता। हाथ से अपने उम्मीदों का है दामन छूटता। क्या यही किस्मत का लेखा क्या यही अंजाम है? खा समुंदर के थपेड़े डोलती अब नाव है। मौत की मजधार में पतवार भी कोई नहीं। राह के भटके हुए को राह की पहचान क्या, सैकड़ों की भीड़ में भी हमसफ़र कोई नहीं। रास्ते दो पास मेरे हार लूं या ठान लूं। खौफ की मुश्किल घड़ी में हार कैसे मान लूं। मिट गया जिसने ज़मीन पर अपने घुठने रख दिये।। चलते-चलते खुद ब खुद ही कफीलों से कट गए। वक्त है दुश्मन के जैसे पर क्यों हारें क्यों थकें। अगर हौसलों ने राह पकड़ी फिर मंजिलें मुश्किल नहीं। राह के भटके हुए को राह की पहचान क्या, सैकड़ों की भीड़ में भी हमसफ़र कोई नहीं।
This poem is based on a true incident of my life. The time of Covid-19 epidemic was going on, at that time I left for home just before the lockdown, but got stuck in the middle. And I had to stay with one of my friends for a month, at that time I have put down on the paper,feelings that were in my mind and now I present it t
What is the recognition of the path to the one who has lost his way? There is no companion even in a crowd of hundreds. Leaving our home, we had set out on the way like this. Turning back for a moment, what I had seen was no one else. It was only a matter of days before we left. It was a long journey of miles; There was happiness, now let it increase. Near again the shape of the floor When your eyes opened. There is no place on the way, no destination. Something had stopped thinking that this journey has stopped. Such is the effect of time that life is ineffective. Courage breaks like the leaves of a branch. The hem of our expectations is out of hand. Is this the article of fate, is this the result? Now the boat is rocking due to the thrashing of the sea. There is no rudder in the vertex of death. What is the recognition of the path to the one who has lost his way? Even in a crowd of hundreds, there is no companion. I have two options, give up or be determined. How to accept defeat in the difficult time of fear. The one who put his knees on the ground is gone. While moving along, they themselves got separated from a group of travelerss. Time is like an enemy, but why to lose, why to get tired. If the spirits hold the path, then the destination is not difficult. What is the recognition of the path to the one who has lost his way? There is no companion even in a crowd of hundreds.
“Obstacles are a part of our life. They are the teachers who help us to identify our strengths and weaknesses.”
“बाधाएं तो हमारे जीवन का हिस्सा हैं।ये वो शिक्षक है जो हमारी खूबियों और ताकत को पहचानने में हमारी मदद करती है।“
जीवन का गंतव्य ढूंढने, चला पथिक मैं अभिलाषी। पथ पर चलकर सत्य ये जाना, कोई नहीं पथ का साथी। हुई घोर निराशा टूटी-आशा, तब सहसा ही यह जाना। लक्ष्य मेरा जीवन मेरा है, मैं ही खुद का संगाती (साथी)। सबके अपने स्वार्थ जुड़े हैं, रिश्ते और जज़्बातों में। तू मेरा है;मैं तेरा, ये शब्द जुड़े आभासों से। सोचो ना आशाएं होती, तो बोलो फिर क्या होता? होते सब जंगल के वासी(पशु समान), या होते सब संन्यासी। प्रेम-त्याग कलयुग में दिखता, बस पुस्तक और बातें में। मैं जानूं और सब ये जाने, है स्वार्थ जुड़ा सब नातों से। सत्संग और उपदेश व्यर्थ है, अगर ये बात नहीं समझी। मतलब के हैं रिश्ते-नाते, मतलब की दुनियादारी। सबकी अपनी-अपनी जरूरत, सबके अपने-अपने बोल। प्रेम के बदले प्रेम न मिलता, रिश्ते हैं माटी के मोल। सबके मुख पर एक मुखौटा, जब उतरे तो भेद खुले। समय बुरा हो जब भी अपना, रिश्ता कौन निभाता है? निश्चल प्रेम तो माता करती, चाहे जो-जैसे हो तुम। पर है पिता का स्थान नहीं कम, जो पालन करते हर दम। जिसने भी है सत्य ये, जन मानव वो सच्चा ज्ञानी। स्वार्थ रहित जो प्रेम साध ले, होवे सबका विश्वासी। जीवन के इस दुर्गम पथ पर, चलते-चलते अब जाना। जो देगा वो ही पायेगा, कठिन नहीं है समझाना। दूजों से चाहो जो कुछ भी, पहले पहल तुझे करनी। यदि सब सबका मुख लगे देखने, बाद पड़ेगी पछतानी।
समय-समय की बात है बंधु, समय बड़ा बलधारी है। कभी मित्र सा परम हितैशी, कभी ये अत्याचारी है। सच ही कहा है बड़े जनों ने, समय ही;समय पर बतलाता। कौन यहां पर कितना अपना, कितना कौन पराया है।
“मां-बाप के सिवा इस दुनिया में मुश्किल से ही ऐसे रिश्ते मिलना मुमकिन है जो आपसे सच्चा प्रेम करते हों।”