यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता(Nothing is wasted here)

कैसे छोटा सा बीज कोई,
एक वृहत वृक्ष बन जाता है।
कैसे माटी का इक ढेला,
जल में हिल्लोल(तरंग)बनाता है।
जग में प्रभु की जो भी रचना,
उसका अब मोल हु समझाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
नन्ही सी चींटी को देखो,
कैसे जी जान लगाती है।
कैसे छोटी की नाव कोई,
तूफानों से टकराती है।
दृढ़ हो निश्चय संकल्प-अटल,
सब कुछ संभव है हो जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
कैसे वेगित हो जल धारा,
पाषाण चीर बढ़ जाती है।
देखो कैसे जल की बूंदे,
मिलकर सागर बन जाती है।
जलते दीपक से तुम सीखो,
अंधेरे से है लड़ जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
निर्जीव-सजीव जो हैं जग में,
सबकी अपनी-अपनी प्रभुता।
स्वयंमेव से तुच्छ बनो न कभी,
प्रभु ने सौंपी अदभुत क्षमता।
जैसे छोटे से पग धरके,
कोई पथ लंघन कर जाता।
प्रभु ने जग में जो कुछ भेजा,
है कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

How a small seed becomes a big tree.
How a earthen lump creates waves in water.
Whatever creation of God in the world,
now I have its value explains.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste here.
Look at the little ant how it tries its best.
How a small boat collides with the storms. .
Be strong in your determination steadfast,
If your determination is strong, then everything is possible.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste here.
How does a stream of water move faster, cutting through even the stones?.
See how the drops of water,
come together to become the ocean.
You learn from the burning lamp,
It fights the darkness.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste.
The inanimate and living things in the world,
Everyone has their own sovereignty.
Never become insignificant on your own accord,
The Lord has given you amazing ability.
Just like taking a small step,
A path Would have skipped.
Whatever God has sent into the world,
nothing goes waste.
Yes nothing goes waste here.

” किसी को भी ख़ुद के कम आंकते हुए उसे उसका उपहास या अपमान करने की भूल ना करें,हो सकता उसमें वह गुण हो जो आपकी क्षमता है परे है। क्योंकि ईश्वर की हर रचना स्वयं में अद्वितीय है।”

“Don’t make the mistake of underestimating or insulting someone; they may have qualities that are beyond your ability. Because every creation of God is unique in itself.”

अकेला(Alone)

अकेलेपन का गम उससे ज्यादा और कोई नहीं समझ सकता, जो अपनों के साथ रहने के बावजूद अकेला महसूस करता हो।

बहुत तकलीफ़ होती है जब अपने साथ होते हुए भी बहुत दूर होते हैं।एक अलग सा दर्द महसूस होता है । ऐसा नहीं कि अपने साथ नहीं देते, मगर कोई आपको समझने वाला नहीं होता। ऐसे में तकलीफ़ दुगनी हो जाती है और इस हाल में हम अक्सर गलत फैसले कर बैठते हैं या कोई गलत आदत अपना लेते हैं,अपनी मायूसी को छुपाने के लिए। लेकिन हमारी दिक्कतें कम नहीं होती, बल्कि और भी ज्यादा बढ़ने लगती हैं । इसलिए अगर आप अकेला महसूस करते हैं तो अपनों से इस बारे में बात कीजिए,अपने दोस्तों से मिलिए और खुद को खुश रहने की कोशिश कीजिए। तभी आप अकेलेपन के भॅवर से निकल सकते हैं वरना डूब जायेंगे।

मुख हैं कुछ तो बोलेंगे(There are mouths, they will say something)

जिसके उर जैसी सोच बसी,
अंतर के पट ही खोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
मत सोच तेरी असफलता पर,
ये लोग व्यंग कर जाते हैं।
शायद तुझको है पता नहीं,
ये कोशिश से डर जाते हैं।
अरे जिसने न कभी कुछ की ठानी,
क्या सफल भला हो पायेंगे?
जिनको दूजा कोई कर्म नहीं,
बस अपना राग बजाएंगे।
जीतने भी हैं खाली बर्तन-2
नीचे गिरते ही बोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
माना कि है तलवार नहीं पर,
कम भी इसका वार नहीं।
मन-हृदय चीर बढ़ जाता है,
विष बुझे बाण बरसाता है।
कभी पुष्पों की वर्षा करता,
कभी मन में फांस चुभाता है।
कटु शब्द है रोक सका कोई-2
मन में जो विष ही घोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
शायद तुमने देखा होगा,
कुछ धूप-छांव के रंगो को
पल-पल जो वेश बदलते हैं,
धरते-तजते हैं संगों को।
कभी काग न गाए कोयल सा,
विषधर न अमृत दान करे।
जो बीज धरा में हो अरोपित,
वैसी ही उपज खलिहान करे।
ये अटल सत्य जाने फिर भी-2
जड़बुद्धि कहां चुप हो लेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेँगे
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।

“अक्सर लोग किसी न किसी बहाने से औरों को नीचा दिखाने या हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं और अपनी भीतर झाँकते तक नहीं। इसलिए ऐसे लोगों की बातों को नज़रंदाज़ करते हुए अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते रहें। क्योंकि जो आज कह रहे हैं कि तुमसे ना हो पाएगा कल वही तुम्हारी सफलता के गीत गायेंगे और कहेंगे मुझे पता था एक न एक दिन ये ज़रूर कुछ बड़ा करेगा।”

भगवान की मूरत (The Statue of God)

लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा।
कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से।
कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है।
जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।

पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।

धैर्य (Patience)

टूट डाल से गिरा धरा पर,
इक नन्हा पीपल का पत्ता।
खोकर भी अस्तित्व था उसने,
धैर्य नहीं तजना सीखा।
इतने में बस आंधी आई,
वो पहुंच गया खलिहानों में।
उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते,
वह पहुंच गया वीरानों में।
थे जहां न वन था वन ही वन,
न जलचर थे, नभचर भी न थे।
बस था अजीब सा सन्नाटा,
था पहुंच गया उड़ते-गिरते ।
कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते,
मुरझाया जो था हरा भरा।
हां किया मृत्यु का स्वागत उसने,
जिसने जीवन भर धीर धरा।

कवि की रचनाएं(Poet’s Creations)

गगन-धरा को एक करे जो,
मरू;सागर से भर लाए।
निर्जन में भी प्राण फूंक दे,
ऐसी कवि की रचनाएं।
हैं ऐसी कवि की रचनाएं ।
शब्दों को लय में जो गूंथे,
भावों का जो सार भरे।
जीवन को प्रकृति से जोड़े,
मानव मन की सृष्टि करे।
शोक के सागर में डूबे की,
तत्क्षण हरती विपदायें।
निर्जन में भी प्राण फूंक दे,
ऐसी कवि की रचनाएं।
हैं ऐसी कवि की रचनाएं।
राजसभा या रंगमंच,
या युद्धक्षेत्र की रणभेरी।
परमप्रभु का भक्तिनाद,
या निर्धन जन की हो डेरी।
प्रतिक्षण-प्रतिपल स्थिति विशेष में,
भिन्न भिन्न यह रूप धरे।
मानव मन में शौर्य,प्रेम
और भक्ति का संचार करे।
रण का भीषण दृश्य दिखाए,
हरि दर्शन भी करवाए।
निर्जन में भी प्राण फूंक दे,
ऐसी कवि की रचनाएं।
हैं ऐसी कवि की रचनाएं ।
कई रसों से व्याप्त काव्य,
यह शिव ताण्डव कहलाता है।
कभी वीर रस में डूबा,
महाराणा प्रताप बन जाता है।
भक्ति रस से सराबोर हो,
ये तुलसी-मीरा-सूर बने।
कभी कृष्ण के प्रेम में डूबा,
राधा का यह रूप धरे।
कभी धरे श्रृंगार रूप तो,
सिया-राम बन जाता है।
कभी कथाओं का माध्यम ले,
रामायण भी कहलाता है।
पग-पग,नव-नव वेष ये धारे,
जन जीवन को सिखलाए।
निर्जन में भी प्राण फूंक दे,
ऐसी कवि की रचनाएं।
हैं ऐसी कवि की रचनाएं ।

कविताओं और कहानियों का हमारे जीवन में सदैव से ही विशेष स्थान रहा है। चाहे वो बचपन में दादा-दादी से सुनी हुई कहानियां हों या किताबों में छपी हुई कविताएं। ये कवियों और लेखकों की रचनाएं ही तो हैं, जो हमारे मन को कल्पनाओं और भावनाओं से भर देती हैं। इन्हें पढ़ते ही हमारा मन कल्पनाओं से सागर में गोते लगाना शुरू कर देता है। ये कल्पनाओं के साथ साथ जीवन की वास्तविकताओं से तो हमारा परिचय कराती ही हैं।साथ ही साथ हमारे भीतर प्रेम, उत्साह,साहस,भक्ति आदि भावनाओं को जगाते हुए हमारा मार्गदर्शन भी करती हैं।

दीपक(Lamp)

मैं दीपक जलना कर्म मेरा।
तम हर्ता हूं यह धर्म मेरा।
नित जलता मैं बुझ जाता हूं।
जीवन संदेश सुनाता हूं।
जैसे सूरज व प्रकृति सदा।
करते निश्चल हो कर्म सभी।
ले नेत्र खोल सुन हे मानव।
तज आशाएं है समय अभी।
जैसे सत्कर्मों की ख्याति।
तोड़े साड़ी सीमाओं को।
वैसे ही परहित दूर करे ।
साड़ी मानव विपदाओं को।
यहां जिसने भी जीता बांटा।
उससे ज्यादा वो पाएगा।
ये पूँजी सच्ची जीवन की।
जो ऊपर ले के जाएगा।
माना लोगो की सोच बुरी पर।
तू भी बुरा तो क्या अन्तर।
विश्वास तू कर दिन आएगा ।
जब जगेगा सबका अंतर।
दूजों से उम्मीद जो कर
तू परहित करता जाएगा।
तो सोच सदा ये कर्म तेरा
फिर लेने देंन कहलेगा।
विक्रेता नहीं तू मानव है।
मानवता बिन कैसा जीवन।
बन जा दीपक कर आलोकित।
धरती पर फैला ये उपवन।

दूसरों की मदद करने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी देखकर जो सुकून मिलता है उसे बयां नहीं किया जा सकता। अगर वैसा ही सुकून आपको भी महसूस करना हो तो किसी जरूरतमंद की मदद करके ज़रूर देखिएगा।”

कौन कहता तूं अकेला ? (Who says you are alone?)

“अकेलेपन से निराश न हों इसे अवसर की तरह समझें जो आपको; खुद को समझने और अपनी खूबियों को पहचानने में मदद करता है।”

आह्वान(Evoke)

ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
उठो करो संधान लक्ष्य का,
बिना रुके चल जाओ।
सन्देह नहीं कि मार्ग है दुष्कर,
पर खिलता है पंक(कीचड़ )में पुष्कर
रत्नाकर-वन-नभ-पर्वत-जन,
आज सभी को बतलाओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
विपिनचंद्र-आज़ाद-भगत,
सावरकर ने बलिदान किया।
गांधी-सुभाष-पंडित-पटेल,
सबने आधार प्रदान किया।
इनकी अभिमानी गौरव गाथा,
जीवन भर गाते जाओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
जन्मभूमि यह दशरथ सुत की,
जिन्होंने जन कल्याण किया।
पितृ वचन के मान हेतु,
दुर्जन वन को प्रस्थान किया।
राम राज्य विस्तार करेंगे,
अब संकल्प करे आओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।

O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Get up, hit the target, Move on without stopping. There is no doubt that the path is difficult. But the lotus blooms in the mud. Sea-Forest-Sky-Mountain, And People tell everyone today. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Vipinchandra-Azad-Bhagat Singh And Savarkar are sacrificed. Gandhi-Subhash-Pandit-Patel, All provided the base. Keep singing his pride saga, For the rest of your life. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory. This is the birthplace of Dashrath’sson (Lord Rama), Who did public welfare. For the honor of father’s promise, He left his home and went to the fearsome forest. Let’s make a resolution that, We will expand the kingdom of Lord Rama. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory.

संपत्ति के बांटे धन घटे।
बन्धु बंटे बल जाय ।
भेद के बांटे मान घटे।
प्रेम बंटे सब जाय।
धर्म के बांटे ईश बंटे।
जाति बंटे मत जाय।
और राष्ट्र के बांटे प्रगति घटे।
परवश(पराधीन) होत सहाय।
उमेश कुमार मिश्र

युद्धक्षेत्र(Battlefield)

ना डर ​​तू उठ महारथी चुनौतियां पुकारती।
यहां न कृष्ण-पार्थ हैं स्वयं ही है तू सारथी।
विपत्तीयों के अंध को तू चीरता प्रकाश है।
है संशयों का स्थान क्या तू ही स्वयं विश्वास है।
हो भय भले सफल न हो विफल भी हो तो दुख नहीं।
जो हुए महान हैं प्रथम कोई सफल नहीं।
है कर्म तेरे हाथ में प्रयास कर प्रयास कर।
कि लक्ष्य प्राप्ति ध्येय हो न और कुछ विचार कर।
समय-2 की बात है तेरा कभी मेरा कभी।
ये गूढ़ तथ्य ज्ञान का भला किसे पता नहीं।
जीवन यह है युद्ध क्षेत्र व कर्म अस्त्र-शस्त्र हैं।
विचारता है क्यों भला यही तो मूल मंत्र है।
भले सगे हों या कोई;तेरा कोई सगा नहीं।
विपत्तियों के होड़ में तू एक संग कोई नहीं।
राह तेरी है कठिन व सामने पहाड़ है।
तू भय न खा कदम बढ़ा गगन सा तू विशाल है।
ना धीर तज निराश हो थका नहीं तू हारकर।
हां वीर है सशस्त्र तूं कि लक्ष्य पर प्रहार कर।