भगवान की मूरत (The Statue of God)

लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा।
कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से।
कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है।
जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।

पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।

सम्मान के योग्य (Worthy for Respect)

माला बनने के लिए फूलों को एक साथ जुड़ना ज़रूरी होता है।अगर फूल अकेला हो तो भगवान उसे केवल अपने चरणों में ही स्थान देते हैं। जबकि वो उस माला को गले से लगाते हैं,जो फूलों की एकता और प्रेम का प्रतीक है,किसी अकेले फूल के अहंकार का नहीं।ठीक उसी प्रकार यदि हम सभी भारतीय ये चाहते हैं,कि विश्व हमें सम्मान की दृष्टि से देखे ;तो हमें मिलकर एक होना होगा। क्योंकि लड़ाई अगर घर में हो तो फ़ायदा हमेशा कोई तीसरा ही उठा ले जाता है। इसलिए सभी वाद और मतभेदों को भुलाकर हमें एक नई शुरुआत करनी होगी।