वीर अभिमन्यु (Brave Abhimanyu)

महाभारत युद्ध में जब अर्जुन त्रिगर्त नरेश सुशर्मा और उनकी सेना से युद्ध करते हुए युद्धभूमि से अधिक दूर चले जाते हैं।तब आचार्य द्रोण चक्रव्यूह का निर्माण करते हैं जिससे पाण्डवों को युद्ध में हराया जा सके और उनके सहित सम्पूर्ण पाण्डव सेना का नाश किया जा सके। पाण्डवों में किसी को भी चक्रव्यूह का तोड़ पता न होने के कारण वे धर्मसंकट में पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चक्रव्यूह का पूर्ण ज्ञान न होने पर भी अर्जुन पुत्र अभिमन्यु व्यूह में जाने का निर्णय करते हैं। नीचे उसी प्रसंग को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

गूंज उठे दिग दशों भयंकर,
अभिमन्यु की गर्जा से।
था विदीर्ण;जिसका लथपथ तन,
पैने बाणों की वर्षा से।
आयु न थी ना था रण अनुभव,
पर पर्वत सम वो खड़ा रहा।
कौरव योद्धाओं के सम्मुख,
अन्त श्वांस तक अड़ा रहा।
है प्रसंग यह कुरुक्षेत्र का,
पांडव जन में है असमंजस।-2
कौन करेगा भेदन इसका,
गुरु द्वारा निर्मित यह व्यूह विकट।
अर्जुन के बिन चक्रव्यूह का,
ध्वंस नहीं हो पाएगा।
लगता मानो आज धर्म का,
शीश अभी झुक जायेगा।
इतने में इक ध्वनि गूंजी,
हे तात! मैं व्यूह में जाऊंगा।-2
पिता नहीं तो क्या अन्तर,
मैं धर्म ध्वजा फहराऊंगा।
माना आयु कम है मेरी,
अधिक न रण मैंने देखा।
किन्तु मातृ के गर्भ में मैंने,
चक्रव्यूह भेदन सीखा।
कष्ट यही इक मात्र हृदय में,
पूर्ण ज्ञान ना ले पाया।
अंतिम चक्र का नाश हो कैसे,
गूढ़ ज्ञान ना ले पाया।
धर्मराज ने रोका चिन्तित हो,
पर अभिमन्यु ना माना।-2
जिसको नव अध्याय था लिखना,
उसने भय ना पहचाना।
और अब………
दृश्य दिखाऊं रणभूमि का,
सम्मुख आए दोनों दल।
शंखनाद के बाद था छाया,
युद्धभूमि में कोलाहल।
भाले से भाले टकराये,
कहीं तीर पर तीर चले।
कहीं गदा ध्वनि कहीं गजगर्जन,
कहीं कहीं दिव्यास्त्र चले।
अब थी बारी अर्जुन सुत की,
चक्रव्यूह में किया प्रवेश।-2
जिसको नव बालक था समझा,
योद्धा निकला कुशल विशेष।
कौरव योद्धा उस बालक के,
बाणों को ना झेल सके।
किया जतन अविरत कितनों ने,
पर उसको ना अवरोध सके।
जहां निकलता था अभिमन्यु,
शत्रु विक्षत हो जाते थे।
वेगवान बाणों के सम्मुख,
तृण-पत्तों सम उड़ जाते थे।
जब आया है चक्र सातवां,
जिसका भय था वही हुआ।-2
इसका भेदन पता नहीं था,
कुरु वीरों ने घेर लिया।
जाने कैसे वीर सभी थे,
युद्ध धर्म ही छोड़ दिया।
सात महारथियों ने मिलकर,
उस एक वीर संग युद्ध किया।
तीरों से घायल था फिर भी,
युद्धभूमि से डिगा नहीं।-2
कुरु महारथियों को अब तक,
ऐसा योद्धा मिला नहीं।
जब कोई भी पार न पाया,
अर्जुन के दुर्जय सुत का।
तब छलने की युक्ति लगाई,
मोह पाश मेंबांध लिया।
बोला जयद्रथ हे अभिमन्यु!,
तेरा मेरा कैसा बैर?-2
सगा नहीं पर सम्बन्धी ठहरा,
रख दे आयुध इक पल ठैर।
बालक ही था चल ना समझा,
जैसे ही हथियार धरे।
वैसे ही कायर वीरों के,
उस पर निर्मम वार हुए।
हो विस्मित वो घाव झेलता,
खड़ा रहा रणभूमि में-2
सोच रहा बचपन मे मैंने,
नाम सुने जिन वीरों के।
स्वप्न था मेरा समरांगण में,
उनसे दो-दो हांथ करूं।
हारूं-जीतूं जो भी कुछ हो,
फिर भी यश को प्राप्त करूं।
लेकिन कायर वीरों से लड़,
अब अपयश ही पाऊंगा।
गर जीता भी तो अपने कुल का,
मैं कैसे मान बढ़ाऊंगा।
सोच रहा था जैसे ही,
तब मस्तक पर आघात हुआ।
मानो बालक के प्राणों पर,
जैसे उल्का पात हुआ।
प्राण त्याग कर गिरा धरा पर,
अर्जुन का जो प्यारा था।
श्री कृष्ण की आंख का तारा,
मां का राजदुलारा था।
पता हो यदि जय है निश्चित,
या अभिमान भुजाओं के बल पर।
कोई भी रण में जा उतरे,
दिखलाए अपना रण कौशल।
पर जब जीत न सम्भव लगती हो,
और अटल सत्य ही हो मृत्यु।
फिर भी जो सिंह रण में गरजे,
वो कहलाता है अभिमन्यु।

धर्मयुद्ध(Crusade)

महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने प्रियजनों और संबंधियों को अपने विरुद्ध खड़ा देख युद्ध से विमुख होकर अपना गाण्डीव रख देते हैं ।तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हुए कहते हैं –

शिथिल भुजायें,शीश झुका,चुपचाप खड़ा क्यों?
दृष्टि उठा,कर अवलोकन ये वही स्वजन हैं।
की पदधूलि तिलक;मस्तक पर जिनकी तूने,
आज उन्हीं को रण में तेरा आमंत्रण है।
देखी द्युत सभा में जिनकी थी प्रभुताई,
अग्निसुता का चीर छीनते लाज ना आई।
जिनके मोह को धार भुजाएँ कंपित तेरी,
देख सुनाते समरांगण में वो रण भेरी।
मूंक पड़े प्रतिमा सम जो थे शीश नवाए,
आज खड़े परकोटे बन हैं सम्मुख आए।
मनन करो उस कपट सभा की वो अनदेखी,
धर्म निबाह की आड़ में स्त्री की लाज ना रक्खी।
तात-गुरु-धर्मज्ञ थे अपना धर्म बचाए,
तब तूं भी तो मौन खड़ा था शीश झुकाये।
केश पकड़ जब खींच रहा था खल-उत्पाती,
चीख रही थी कुल मर्यादा बन बेचारी।
पर कैसे मैं चुप रहता रव-क्रंदन सुनकर,
आना पड़ा था मुझको फिर योगेश्वर बनकर।
अब देख रहा क्या चाप उठा प्रत्यंचा कस ले,
शर वर्षा कर आज समूचे नभ को ढक दे।
महाकाल बन जा ऐसे की काल भी कांपे,
कोई आंख उठा कर किसी स्त्री को ना ताके।
एक-एक के शीश गिरा दे रणभूमि में,
जैसे तिनके उड़ जाते मदमस्त पवन में।
यदि अब भी तूं मूक रहा तो यह भी सुन ले,
हर युग होंगे चीरहरण अब तो तू सुध ले…..।
यह सब सुन अर्जुन उठकर है धनुष उठाता,
फिर बाणों के बादल से अम्बर छा जाता।

नोट: ऊपर दी गई कविता में महाभारत युद्ध के श्री कृष्ण और अर्जुन के सारे प्रसंग को एक छोटी सी रचना में संजोना संभव नहीं था। इसलिए इसका एक अंश मात्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

संघर्ष (Struggle)

गिरने से क्यों घबराता है?
छोटा बालक भी गिरता है।
जलती भट्टी में तपकर ही तो,
स्वर्ण से कुंदन बनता है ।
फल-फूल के बोझे को सहकर,
तरुवर भी यश के पात्र बनें।
मानव कष्टों को हरकर ही,
गंगा भी जग की मातु बने।
कालकूट विष को पीकर,
शिव महादेव बन जाते हैं।
गुरु-मातु-पिता मे श्रद्धा रख राघव,
मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
यदि बनना है कुछ जीवन में,
तो सूरज सा तपना होगा।
यश-मान को धारण करना हो,
तो कुम्भ सा भी पकना होगा।
जिनकी भी ख्याति है जग में,
बिन त्याग के कोई नाम नहीं।
सच ही कहते है मानव का,
संघर्ष बिना सम्मान नहीं।-2

“इन्सान को सफल बनना है तो, मूल्य तो चुकाना पड़ेगा। बिना परिश्रम और त्याग के कोई भी महान नहीं बनता।”

आस (Hope )

“कहते हैं दुनिया उम्मीद पर ही कायम है;जिसने उम्मीद छोड़ दी,उसने जीना छोड़ दिया। इसलिए अपने लिए ना सही; दूसरों के लिए ही उम्मीद के हांथ को थामे रक्खे। क्या पता आप किसी की उम्मीद, किसी प्रेरणा हो और नहीं हैं तो क्या पता बन जाएं।”

कौन कहता तूं अकेला ? (Who says you are alone?)

“अकेलेपन से निराश न हों इसे अवसर की तरह समझें जो आपको; खुद को समझने और अपनी खूबियों को पहचानने में मदद करता है।”

आह्वान(Evoke)

ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
उठो करो संधान लक्ष्य का,
बिना रुके चल जाओ।
सन्देह नहीं कि मार्ग है दुष्कर,
पर खिलता है पंक(कीचड़ )में पुष्कर
रत्नाकर-वन-नभ-पर्वत-जन,
आज सभी को बतलाओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
विपिनचंद्र-आज़ाद-भगत,
सावरकर ने बलिदान किया।
गांधी-सुभाष-पंडित-पटेल,
सबने आधार प्रदान किया।
इनकी अभिमानी गौरव गाथा,
जीवन भर गाते जाओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।
जन्मभूमि यह दशरथ सुत की,
जिन्होंने जन कल्याण किया।
पितृ वचन के मान हेतु,
दुर्जन वन को प्रस्थान किया।
राम राज्य विस्तार करेंगे,
अब संकल्प करे आओ।
ऐ भारत के वीर सपूतों!
विजय पताका फहराओ।

O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Get up, hit the target, Move on without stopping. There is no doubt that the path is difficult. But the lotus blooms in the mud. Sea-Forest-Sky-Mountain, And People tell everyone today. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory . Vipinchandra-Azad-Bhagat Singh And Savarkar are sacrificed. Gandhi-Subhash-Pandit-Patel, All provided the base. Keep singing his pride saga, For the rest of your life. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory. This is the birthplace of Dashrath’sson (Lord Rama), Who did public welfare. For the honor of father’s promise, He left his home and went to the fearsome forest. Let’s make a resolution that, We will expand the kingdom of Lord Rama. O brave sons of India!; Hoist the flag of victory.

संपत्ति के बांटे धन घटे।
बन्धु बंटे बल जाय ।
भेद के बांटे मान घटे।
प्रेम बंटे सब जाय।
धर्म के बांटे ईश बंटे।
जाति बंटे मत जाय।
और राष्ट्र के बांटे प्रगति घटे।
परवश(पराधीन) होत सहाय।
उमेश कुमार मिश्र

सन्देश (The Massage)

एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है?
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर; क्या मक्का है?
है रही बंटी चौराहे की,
पर मिलना सबको बस एक जगह।
न राम ने बोला मंदिर जा,
न खुदा कहे मस्जिद में रह।
जो बात लिखी कोरे मन पे,
जो पढ़ा-पढ़ाया-सीखा है।
जो छुपा कुरान-ए-शरीफ में है,
वो ही पैगम तो गीता है।
सब का बस एक सबक है जी,
जो चाहोगे देना होगा।
ये बात भी है तुम पर ठहरी,
तुम्हारे मन में क्या रखा है?
एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर;क्या मक्का है?
हो जाति धर्म का प्रश्न भले,
कब इसे किसका भला किया?
दिल को बस टुकड़ों में बांटा,
भाई-भाई से जुदा किया।
बच्चों से तुम लो सीख सदा,
क्या धर्म जाति का भान उन्हें?
जिसको पाया वो अपना है,
मेरा तेरा न ज्ञान उन्हे।
बच्चे प्रतिरूप है ईश्वर का,
ये सारा जग समझाता है।
जब इनको भेद नहीं आता,
तो तुम्हें कौन सिखता है?
उपरवाला न सिखलाये,
ये ऊंच-नीच-जाति-मज़हब।
ये उपज है तुच्छ विचारों की,
मुर्दे ना चुने श्मशान या कब्र।
हम सब धरती की संताने,
जो बस इंसान ही थे पहले।
जब मुस्लिम-हिंदू-सिख बने,
बस आप में टकराते हैं।
एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है?
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर; क्या मक्का है?

“जैसे जल की एक बूंद कभी भी सागर नहीं बन सकती। वैसे ही राष्ट्र का विकास कोई भी जाति-धर्म या सम्प्रदाय स्वयं अपने बल पर नहीं कर सकता।उसके लिए सभी को एक साथ आना पड़ेगा।”

क्योंकि हांथ की पांचों उंगलियां मिलकर ही मुट्ठी बनाती है

और एक अकेली ऊंगली दुश्मनी और गुस्से को भड़काती है।”

युद्धक्षेत्र(Battlefield)

ना डर ​​तू उठ महारथी चुनौतियां पुकारती।
यहां न कृष्ण-पार्थ हैं स्वयं ही है तू सारथी।
विपत्तीयों के अंध को तू चीरता प्रकाश है।
है संशयों का स्थान क्या तू ही स्वयं विश्वास है।
हो भय भले सफल न हो विफल भी हो तो दुख नहीं।
जो हुए महान हैं प्रथम कोई सफल नहीं।
है कर्म तेरे हाथ में प्रयास कर प्रयास कर।
कि लक्ष्य प्राप्ति ध्येय हो न और कुछ विचार कर।
समय-2 की बात है तेरा कभी मेरा कभी।
ये गूढ़ तथ्य ज्ञान का भला किसे पता नहीं।
जीवन यह है युद्ध क्षेत्र व कर्म अस्त्र-शस्त्र हैं।
विचारता है क्यों भला यही तो मूल मंत्र है।
भले सगे हों या कोई;तेरा कोई सगा नहीं।
विपत्तियों के होड़ में तू एक संग कोई नहीं।
राह तेरी है कठिन व सामने पहाड़ है।
तू भय न खा कदम बढ़ा गगन सा तू विशाल है।
ना धीर तज निराश हो थका नहीं तू हारकर।
हां वीर है सशस्त्र तूं कि लक्ष्य पर प्रहार कर।

धुंधली यादें(Hazy Memories)

कुछ कही सुनी सी बातें हैं,
कुछ कहे सुने से किस्से हैं।
दिल में कुछ- कुछ है खालीपन,
धुंधली यादों के हिस्से हैं।
कुछ खुशियों की किलकारी है।
कुछ रोते बचपन के मुखड़े।
कुछ पल जो बीते अपनों संग।
कुछ-कुछ टूटे दिल के टुकड़े।
पर बीती यादों से फ़र्क किसे?
जब टूटे-बिखरे रिश्ते हैं।
कुछ कही सुनी सी बातें हैं,
कुछ कहे सुने से किस्से हैं।
दिल में कुछ-कुछ है खालीपन,
धुंधली यादों के हिस्से हैं।
ये वक्त ये पल बस दो दिन के।
गुजरे जब भी क्या लौटेंगे?
है आज भी जो कल शायद न हो।
दिल से दिल को कब जोड़ेंगे।
मन में छाई जो कड़वाहट,
बातें भी घर कर लेते हैं।
रिश्तों की नाज़ुक धागे को,
गांठों से फिर भर देती है।
है हाथ वही जो कुछ लगना,
जिसके किस्मत जो हिस्से हैं।
कुछ कही सुनी सी बातें हैं,
कुछ के लिए से किस्से हैं।
दिल में कुछ- कुछ है खालीपन,
धुंधली यादों के हिस्से हैं।

Some things are heard somewhere,
Some are stories from hearsay.
There is some emptiness in the heart,
There are parts of hazy memories.
Some shout of happiness.
Some crying childhood faces.
Some moments spent with loved ones. Pieces of a broken heart.
But who cares about past memories?
When there are broken relationships.
Some things are heard somewhere,
Some are stories from hearsay.
There is some emptiness in the heart,
There are parts of hazy memories.
This time, this moment is just for two days. Even after this passes,
What will they return?
It is there today which may not be there tomorrow.
When will you connect heart to heart?
Whenever bitterness fills the heart,
Things also make a home in the heart.
To the delicate thread of relationships,
Fills again with knots.
Whatever you feel in your hand,
Whose fate is a part.
Some things are heard somewhere,
For some there are tales.
There is some emptiness in the heart,
There are parts of hazy memories.

बदलती दुनिया(Changing World)

वक्त बदलते देखा है
हालात बदलते देखे हैं।
इस मोल भाव की दुनिया में,
जज़्बात बदलते देखे है।
मैंने देखा है लोगों की,
एक पल में सोच बदल जाना।
हां देखा मैंने अपनों का,
मतलब के बाद मुकर जाना।
देखा मैंने परछाई का,
सूरज सर चढ़ते ही छुप जाना।
देखे धोका देने वाले,
देखा है उनका मुस्काना।
मैंने देखा है अपने ही,
रिश्तों को नंगा करते हैं।
मैंने देखा है यारों का,
मतलब के संग निकल जाना।
हां देखा रिश्तों का जुड़ना,
देखा लोगों का पछताना।
सब देखा मैंने लोग कई,
गिरगिट बन रंग बदलते हैं।
हां वक्त हमें समझाता है,
सब वक्त पे संग बदलते हैं।

I have seen the time changing.
I have seen the time changing.
I have seen the situation changing.
In this world of bargains,we have seen the changing of emotions.
I have seen people’s thinking change in a moment.
Yes,I have seen my loved ones turn away after meaning.
I saw the shadow of the sun disappear as soon as it rises.
See those who cheat, have seen their smile.
I have seen that they strip their own relationships.
I have seen that the meaning of friends is to leave with them.
Yes,saw the connection of relationships, saw the repentance of people.
I have seen, many people change their behavior with others according to their benefit & situation like chameleon.
Yes,Time teaches us,everyone changes company at times.

“दूसरों के साथ की उम्मीद हद तक और दूसरों का साथ अपने मतलब तक ?”

“Why do we expect others to support us till the end, when it is our turn to support them only till our selfishness is met”