मुसीबत की तपिश से घिरा कब से ढूंढ रहा हूं पर फिर भी, लाख कोशिशों के बावजूद; मुझे मेरा अक्स दिखाई नहीं देता।
जब सूरज सिर चढ़ता है तो अपनी परछाई भी छोड़ देती है। जब अपनी परछाई ने ही साथ नहीं दिया तो औरों से क्या शिकायत करना। लेकिन जो आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा रहे,वही आपका सच्चा साथी है; सम्बन्धी है।ऐसे लोग ही आपकी सच्ची पूँजी हैं। इसलिए ऐसे लोगों को कभी भी खोना नहीं चाहिए।
मुकम्मल है मगर फ़िर भी, मुक्कमल हो नहीं सकती। हमारी है मगर फ़िर भी, ये बस मेरी कहानी है। तू मेरा साथ दे;ना दे, मैं तेरे संग हूं हरदम। अगर दम ना रहे फ़िर भी, मुझे यारी निभानी है। मुकम्मल है मगर फ़िर भी, मुक्कमल हो नहीं सकती। हमारी है मगर फ़िर भी,ये बस मेरी कहानी है। यूं सोचा था हमारे भी, ज़माने में निशान होंगे। कुछ अपनी मंजिलें होंगी, कुछ अपने कारवां होंगे। मगर यूं देखता हूं, चन्द कदमों की जो दूरी पर, तेरी राहे-मेरी राहें, अलग होकर ही जानीं हैं । मुकम्मल है मगर फ़िर भी, मुक्कमल हो नहीं सकती। हमारी है मगर फ़िर भी, ये बस मेरी कहानी है…..।
रिश्ते अक्सर टूट जाते हैं या फ़िर इक तरफा होते हैं। ज़रूरी नहीं कि जिसे आप चाहें,वो भी आपको चाहे या फिर ये भी हो सकता है कोई वजह रही हो उसके दूर होने की। एक रास्ते पर चलने वालों की मंज़िल हमेशा एक ही हो ये ज़रूरी तो नहीं। ये बात बस लड़का और लड़की के बीच के आपसी रिश्ते की ही नहीं है, और भी कई रिश्ते हैं जिनका हाल ऐसा ही है। इसलिए जो रूठे हैं,हो सके तो उन्हें मना लें और जो जाना चाहते हैं, उन्हें जाने दें। क्योंकि प्यार हो या अपनापन उससे बस किसी को जताया जा सकता है, उससे बांधा नहीं जा सकता।
लड़खड़ाते कदमों और तोतली ज़ुबान पर आज वो हंसता रह गया। जिसे हमने चलने और बोलने का हुनर सिखाया है।
जाने-अनजाने में हम अपने बड़ों; ज्याद़ातर अपने माता-पिता और बुजुर्गों का अपमान करते रहते हैं। और जब ख़ुद पर बितती है,तो हमें तकलीफ़ होती है। हमें यह समझना चाहिए कि भावनाएं सभी के भीतर है। उम्र के जिस पड़ाव पर इन्सान की सहनशक्ति और शारीरिक क्षमता बहुत कम हो जाती है, उस पड़ाव हम उनकी इस प्रकार हँसी उड़ाते हैं और उन्हें अपशब्द बोलेते हैं। कहा जाता है बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं, यदि यह बात सच है तो सोच लो कल जब आपकी बारी आयेगी तो आपको कैसा लगेगा…….?
Knowingly or unknowingly we are our elders; Most of them keep insulting their parents and elders. And when it is spent on ourselves, we feel pain. We must understand that emotions are within everyone. At the stage of age at which the stamina and physical capacity of a person becomes very less, at that stage we make fun of them in this way and speak abusive words. It is said that children learn from their elders only, if this is true then think how will you feel tomorrow when your turn comes…….?
कल-कल करते बीत गए दिन, तू हारा और जीत गए दिन। इनका लाभ क्यूं ना ले पाया? अब किस-किस को समझाएगा? सबके दिन आए और बीते, तेरा दिन कब आयेगा? कह तेरा दिन कब आयेगा? दो दिन के लिए पग चार चला, बस दिवा स्वप्न ही बुनने को। जग को ठगता तो बात भी थी, तू मिला तुझे ही ठगने को। इस जग में अनमोल समय खोकर, कुछ पाकर कैसे जाएगा? पहले से कुछ अलग किए बिन, अलग भला दिख पाएगा? सबके दिन आए और बीते, तेरा दिन कब आयेगा? कह तेरा दिन कब आयेगा? आज की बातें कल पर डाली, गढ़ डाले झूठे किस्से। तिल भर का भी कर्म किया ना, मिला वही जो है हिस्से। बोला था कि जग जीतेगा, अपना नाम बनायेगा। पर भीतर था पता तुझे, तू ख़ुद से ही मुंह की खायेगा। ये ईंटों का महल हवाई, अब किस-किस को दिखलाएगा? सबके दिन आए और बीते, तेरा दिन कब आयेगा? कह तेरा दिन कब आयेगा? कभी पंख बिन विहग न उड़ते, उगे कृषक बिन अन्न कहां? बिना श्वास के प्राण न टिकते, बिना लक्ष्य जीवन कैसा? बिन यत्नों शैय्या पर बैठे, लक्ष्य को कैसे पाएगा ? यूं ही सोचा है;सोच रहा, और सोच सोच ही जायेगा। सबके दिन आए और बीते, तेरा दिन कब आयेगा? कह तेरा दिन कब आयेगा?
Will do tomorrow saying that the days have passed. You lose and the day wins. Why couldn’t you take advantage of them? Now to whom will you explain? Everyone’s days have come and gone, When will your day come? Say when will your day come?Walked four steps for two days, Just to day dream Cheating the world was also a matter, You cheated yourself. Losing precious time in this world, How will you go after getting something? Without doing anything different from before, Would you be able to look different? Everyone’s days have come and gone, When will your day come? Say when will your day come?Today’s things postponed for tomorrow, Fabricated false stories. You did even a little work,didn’t you?You got what you deserved. You said to the world will win, Will make a name for himself. But you knew it was inside You will be defeated by yourself. This brick palace is aerial, Now he will show it to whom. Everyone’s days have come and gone, When will your day come? Say when will your day come? Say when will your day come? Birds never fly without wings, Where does food grow without a farmer? Life does not go on without breath, How is life without a goal? Sitting on the bed without effort, How to achieve the goal? Just thought; Thinking,and will keep thinking. Everyone’s day has come and gone, When will your day come? Tell me when will your day come?
हम सभी की एक बुरी आदत है कि हम आज के काम को हमेशा कल के लिए टाल देते और इसी मानसिकता के कारण हमारा कल कभी नहीं आता। इसीलिए हम अपनी वर्तमान समस्याओं और भविष्य के सुनहरे ख्यालों में हमेशा खोए तो रहते हैं पर अपने मन मुताबिक कुछ हासिल नहीं कर पाते।
सारी सच्चाई तस्वीरें बयां नहीं करती। कुछ अनकहे किस्से छूट जाया करते हैं।
ज़िंदगी का हाल भी तस्वीर के जैसा ही है,कोई कितनी भी कोशिश कर ले; कुछ किस्से अधूरे ही रह जाते हैं। इन्सान को वो सब कुछ नहीं मिल पाता ,जो उसकी ख्वाहिश होती है। भले ही उसने; उसके लिए क्या कुछ न झेला हो। किसी ने सच ही कहा है एक तस्वीर,पूरी ज़िंदगी बयां नहीं कर सकती।..।
महाभारत युद्ध में जब अर्जुन त्रिगर्त नरेश सुशर्मा और उनकी सेना से युद्ध करते हुए युद्धभूमि से अधिक दूर चले जाते हैं।तब आचार्य द्रोण चक्रव्यूह का निर्माण करते हैं जिससे पाण्डवों को युद्ध में हराया जा सके और उनके सहित सम्पूर्ण पाण्डव सेना का नाश किया जा सके। पाण्डवों में किसी को भी चक्रव्यूह का तोड़ पता न होने के कारण वे धर्मसंकट में पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चक्रव्यूह का पूर्ण ज्ञान न होने पर भी अर्जुन पुत्र अभिमन्यु व्यूह में जाने का निर्णय करते हैं। नीचे उसी प्रसंग को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।
गूंज उठे दिग दशों भयंकर, अभिमन्यु की गर्जा से। था विदीर्ण;जिसका लथपथ तन, पैने बाणों की वर्षा से। आयु न थी ना था रण अनुभव, पर पर्वत सम वो खड़ा रहा। कौरव योद्धाओं के सम्मुख, अन्त श्वांस तक अड़ा रहा। है प्रसंग यह कुरुक्षेत्र का, पांडव जन में है असमंजस।-2 कौन करेगा भेदन इसका, गुरु द्वारा निर्मित यह व्यूह विकट। अर्जुन के बिन चक्रव्यूह का, ध्वंस नहीं हो पाएगा। लगता मानो आज धर्म का, शीश अभी झुक जायेगा। इतने में इक ध्वनि गूंजी, हे तात! मैं व्यूह में जाऊंगा।-2 पिता नहीं तो क्या अन्तर, मैं धर्म ध्वजा फहराऊंगा। माना आयु कम है मेरी, अधिक न रण मैंने देखा। किन्तु मातृ के गर्भ में मैंने, चक्रव्यूह भेदन सीखा। कष्ट यही इक मात्र हृदय में, पूर्ण ज्ञान ना ले पाया। अंतिम चक्र का नाश हो कैसे, गूढ़ ज्ञान ना ले पाया। धर्मराज ने रोका चिन्तित हो, पर अभिमन्यु ना माना।-2 जिसको नव अध्याय था लिखना, उसने भय ना पहचाना। और अब……… दृश्य दिखाऊं रणभूमि का, सम्मुख आए दोनों दल। शंखनाद के बाद था छाया, युद्धभूमि में कोलाहल। भाले से भाले टकराये, कहीं तीर पर तीर चले। कहीं गदा ध्वनि कहीं गजगर्जन, कहीं कहीं दिव्यास्त्र चले। अब थी बारी अर्जुन सुत की, चक्रव्यूह में किया प्रवेश।-2 जिसको नव बालक था समझा, योद्धा निकला कुशल विशेष। कौरव योद्धा उस बालक के, बाणों को ना झेल सके। किया जतन अविरत कितनों ने, पर उसको ना अवरोध सके। जहां निकलता था अभिमन्यु, शत्रु विक्षत हो जाते थे। वेगवान बाणों के सम्मुख, तृण-पत्तों सम उड़ जाते थे। जब आया है चक्र सातवां, जिसका भय था वही हुआ।-2 इसका भेदन पता नहीं था, कुरु वीरों ने घेर लिया। जाने कैसे वीर सभी थे, युद्ध धर्म ही छोड़ दिया। सात महारथियों ने मिलकर, उस एक वीर संग युद्ध किया। तीरों से घायल था फिर भी, युद्धभूमि से डिगा नहीं।-2 कुरु महारथियों को अब तक, ऐसा योद्धा मिला नहीं। जब कोई भी पार न पाया, अर्जुन के दुर्जय सुत का। तब छलने की युक्ति लगाई, मोह पाश मेंबांध लिया। बोला जयद्रथ हे अभिमन्यु!, तेरा मेरा कैसा बैर?-2 सगा नहीं पर सम्बन्धी ठहरा, रख दे आयुध इक पल ठैर। बालक ही था चल ना समझा, जैसे ही हथियार धरे। वैसे ही कायर वीरों के, उस पर निर्मम वार हुए। हो विस्मित वो घाव झेलता, खड़ा रहा रणभूमि में-2 सोच रहा बचपन मे मैंने, नाम सुने जिन वीरों के। स्वप्न था मेरा समरांगण में, उनसे दो-दो हांथ करूं। हारूं-जीतूं जो भी कुछ हो, फिर भी यश को प्राप्त करूं। लेकिन कायर वीरों से लड़, अब अपयश ही पाऊंगा। गर जीता भी तो अपने कुल का, मैं कैसे मान बढ़ाऊंगा। सोच रहा था जैसे ही, तब मस्तक पर आघात हुआ। मानो बालक के प्राणों पर, जैसे उल्का पात हुआ। प्राण त्याग कर गिरा धरा पर, अर्जुन का जो प्यारा था। श्री कृष्ण की आंख का तारा, मां का राजदुलारा था। पता हो यदि जय है निश्चित, या अभिमान भुजाओं के बल पर। कोई भी रण में जा उतरे, दिखलाए अपना रण कौशल। पर जब जीत न सम्भव लगती हो, और अटल सत्य ही हो मृत्यु। फिर भी जो सिंह रण में गरजे, वो कहलाता है अभिमन्यु।
देवभूमि अर्थात् देवताओं की भूमि जिसे सम्पूर्ण विश्व भारत के नाम से भी जानता है,क्योंकि यहां सर्वाधिक देवताओं का निवास है।भारत देवभूमि यूं ही नहीं कहलाता इस सम्बंध में कई विषय चर्चित हैं। लेकिन आज हम यहां केवल एक विषय की चर्चा करेंगे -देवीय अवतारों की। अवतार क्या है ?यह बात हर भारतवासी को पता है।ईश्वर आदिकाल से ही समय समय पर मानवता की रक्षा के लिए अपने अंशरूप में धरती पर आते रहे हैं। परन्तु यह अर्धसत्य है।ईश्वरीय अवतारों का उद्देश्य केवल मानवों की रक्षा या फिर उनके कष्टों का निवारण ही नहीं हैं बल्कि उनको यह सीख देना भी है कि मानवता का उद्देश्य क्या है। इन्हीं कारणों से इस धरती पर ईश्वर;मानवीय रूप धारण कर अनेकों कष्ट सहते आए हैं। जिससे हमें यह सीख मिल सके कि पशु हो,दानव हो या फिर मानव;अपने सद्गुणों और धर्म के बल पर कोई भी देवत्व प्राप्त कर सकता है। आदिकाल में जितने भी अवतार हुए चाहे वो श्रीराम हों या श्रीकृष्ण,माता सीता हो या बजरंगबली हनुमान,श्री परशुराम हों या श्री लक्ष्मण या फिर भगवान बुद्ध;सभी ने अपने जीवन में चरित्र,मर्यादा,धर्म और मानवता का पालन करते हुए अनेक कष्ट सहे, जिससे हमें उनके चरित्र से शिक्षा ले सकें। तनिक सोचिए त्रेता में श्रीराम को आवश्यकता ही क्या थी कि उन्हें वन-वन भटकना पड़े और अपनी पत्नि सीता के लिए समुद्र पार करके रावण से लड़ना पड़े। वो चाहते तो अयोध्या का राज्य ग्रहण कर सकते थे और वानरों की सहायता लिए बिना ही एक बाण से रावण का वध कर सकते थे।परंतु नहीं ,उन्होंने जग को यह सन्देश दिया कि माता-पिता की आज्ञा देवताओं के लिए भी सर्वोपरि हैं,भाईयों में आपसी प्रेम और सहयोग की भावना हो तो मानव ;रावण जैसे अपराजेय शत्रु से भी जीत सकता है, नारी को बराबर का स्थान व सम्मान मिलना चाहिए और माता सीता ने सन्देश दिया कि एक नारी को सदैव अपने पति का साथ देना चहिए भले ही वह कितनी भी बुरी दशा में हो। हनुमान जी से निःस्वार्थ भक्ति और आस्था,लक्ष्मण जी से अनन्य भ्रातृप्रेम और सेवाभाव की शिक्षा मिलती है। और द्वापर के श्रीकृष्ण से निश्चल प्रेम,निःस्वार्थ मित्रता के साथ-साथ यह सीख भी मिलती है कि यदि कोई मानव धर्म और नारी सम्मान की रक्षा के लिए खड़ा होता है तो स्वयं ईश्वर भी उसका सारथी बन उसे राह दिखाते हैं। अतः सभी देव अवतारों का उद्देश्य मानव को जीवन में प्रेम,त्याग,धर्म,कर्त्तव्य का महत्व समझाना रहा है।
सड़क पर मर रहे घायल की मदद कौन करे? मुसीबत मोल लेने से अच्छा उसकी वीडियो ही वायरल करते हैं।😔
Who will help the injured dying on the road? It is better to make a video of it and make it viral than to get in trouble.😔
आज कल हमारी सोच इतनी घटिया होती जा रही है कि अगर कोई सड़क पर मर रहा हो या या कहीं कोई तकलीफ़ से गुजर रहा हो तो हम उसकी मदद करनी के बजाय उसका तमाशा देखते रहते हैं। सोशल मीडिया पर उसका वीडियो और तस्वीरें अपलोड कर देते हैं ।लेकिन बात जब हम पर आती है तो हम लोगों को इंसानियत की दुहाई देते हैं । क्या यही हमारी सोच है? क्या इसीलिए मानव को ईश्वर की सबसे उत्कृष्ट रचना माना गया हैं ? यदि मानव ही मानवता छोड़ दे तो हममें और पशुओं में अन्तर ही क्या है….?
Nowadays our thinking is becoming so bad that if someone is dying on the road or someone is going through trouble, instead of helping them, we keep watching their spectacle. We upload his videos and pictures on social media. But when it comes to our turn, we make people cry for humanity. Is this what we think? Is that why human is considered the excellent creation of God? If humans leave humanity, then what is the difference between us and animals…..?
दो दिन की जीत पर इंसान,यूं इतराना नहीं अच्छा। ये तो बस इक खेल था,अभी तो पूरी जंग बाकी है।
Man, on the victory of two days, it is not good to boast like this. This was just a game, the whole war is yet to come.
अपनी उपलब्धियों पर गर्व किया जा सकता है लेकिन घमंड नहीं। चन्द कामों में सफलता पाकर दूसरों के साथ अकड़कर बात करना अच्छी बात नहीं होती। इन्सान को अपनी विनम्रता कभी भी खोनी नहीं चाहिए।