अगर जेब में भारीपन और कपड़ो में महंगाई की झलक हो, तो दुनियां कभी ये नहीं पूछती कि ये दौलत कहां से आयी ?
इस दुनिया में पैसे की कीमत इन्सान से ज़्यादा हो गई है।इसके आगे प्यार, मुहब्बत, रिश्ते,नाते सब बे मायने होते जा रहे हैं।आज कल सफ़लता की निशानी बस पैसा हो गया है। बात कड़वी है; मगर सच है कि आजकल लोगों की ज़रूरतें और मानसिकता पैसे से इतनी ज़्यादा जुड़ चुकी है,कि आज मर रहे इंसान की ज़िंदगी के अलावा पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। पैसे और सम्पत्ति के लिए भाई-भाई और दोस्त-दोस्त का दुश्मन बन बैठा है। अगर आप अमीर हैं, आपके पास बेहिसाब पैसा है तो आपसे कोई ये नहीं पूछेगा कि आपके पास इतना सारा पैसा कहां से आया । भले ही वो पैसे आपने किसी गलत रास्ते को अपनाकर ही क्यों न कमाया हो।
जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? हक की खातिर तो लड़ना बनता, पर बांट भला अधिकार कहां। छोटे-मोटे मतभेदों में, प्रतिकार सा निम्न विचार कहां। छोटी मोटी तू-तू-मैं मैं, किस मोड़ भला पहुंचाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। ये सोच सदा सब कुछ बांटे। बांटी धरती-अम्बर-सागर। घर-द्वार-पिता-मां-संबंधी, सबको दो राहे पर लाकर। यह दो शब्दों की रीति भला। अब कौन सा खेल दिखाएगी? बस जीवन को झुलसाएगी, संबंधों को खा जाएगी। जो बांट लगी है हम-तुम में, वो बांट कहां तक जाएगी? खुद की सोचे से है घटता, धन-धान्य-शक्ति-भाईचारा। सबके सोचे से है बढ़ता, जग में जो कुछ भी है प्यारा। यदि बांटे की मंशा तेरी, तो बांट दया-शांति-समता, दे बांट जो मन में प्रेम भरा, हाँ बांट तू अच्छी सीख सदा। ये सोच ही सच्ची जीवन की, पीढ़ी को राह दिखायेगी। अब बांट लगा सत्कर्मों तेरी झोली भर जाएगी। हाँ बांट लगा तू देर न कर। खुशियां जग में मुस्काएंगी।
“आपसी मतभेदों के कारण हमनें आस पास लकीरें खींच रक्खी हैं । मानवता को बांटने के लिए हमनें जाति,धर्म,भाषा,समाज,देश;सबके टुकड़े कर दिए।किसी को भी नहीं छोड़ा और इसीलिए आज हमें अपने चारों ओर दुश्मन ही दुश्मन दिखाई देती हैं। इस दुश्मनी को अगर ख़त्म करना है तो हमें अपने दिल से इस बंटवारे की भावना का अन्त कर, प्रेम को स्थान देना होगा।”
लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा। कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से। कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है। जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।
पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।
टूट डाल से गिरा धरा पर, इक नन्हा पीपल का पत्ता। खोकर भी अस्तित्व था उसने, धैर्य नहीं तजना सीखा। इतने में बस आंधी आई, वो पहुंच गया खलिहानों में। उड़ते-उड़ते-गिरते-गिरते, वह पहुंच गया वीरानों में। थे जहां न वन था वन ही वन, न जलचर थे, नभचर भी न थे। बस था अजीब सा सन्नाटा, था पहुंच गया उड़ते-गिरते । कुछ पल बीता,कुछ दिन बीते, मुरझाया जो था हरा भरा। हां किया मृत्यु का स्वागत उसने, जिसने जीवन भर धीर धरा।
किसी भी लक्ष्य को पाना यूं ही आसान नहीं होता।आज हम जितने भी सफल लोगों को देखते, सुनते या पढ़ते हैं,वे सभी यूं हीं सफल नहीं हुए। उनका भी अपना संघर्ष पूर्ण इतिहास रहा है;कुछ अनकहे किस्से रहे हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने की;इसे जीतने की जो उनकी यात्रा रही है, उसके दौरान उन्होने क्या कुछ सहा है; क्या कुछ झेला है ये बस उन्हीं को पता है। जिन्होंने अपने लक्ष्य प्राप्ति में संघर्ष करते हुए वर्षों लगा दिए।
ज़रा सोचिए जब भी हम औरों से कुछ अलग करते हैं या कोई बड़ा लक्ष्य बनाते हैं तो अक्सर परिवार और समाज हमें हतोत्साहित करने; रोकने का प्रयास करता है और जब भी हम उनकी बातों को अनसुना कर अपने लक्ष्य के लिए प्रयास प्रारम्भ करते हैं तो हमारा सामना अपने भीतर की दुर्बलताओं से होता है।चूंकि बड़े लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समय लगता है और बड़ा त्याग भी करना पड़ता है।
इसलिए कई बार हमारी हिम्मत जवाब दे जाती है और मन कहता है कि अब बस तुझे रुक जाना चाहिए, ये प्रयास छोड़ देना चाहिए। ये बात तेरे बस की नहीं है। यही वो निर्णायक क्षण है जो यह निर्धारित करता है कि हम क्या बनेंगे ? साधारण या असाधरण। यदि हम अपनी तकलीफों को नज़र-अंदाज़ करते हुए अपनी पूरी शक्ति अपने लक्ष्य प्राप्ति में झोंक देते हैं तो हमारी गणना असाधारण व्यक्तित्व की श्रेणी में होगी अन्यथा कहीं भी नहीं, क्योंकि साधारण व्यक्तिव की पूछ कहीं भी नहीं होती।
अक्सर लोग केवल उन्हीं को याद करते हैं जिनके जैसे वो बन नहीं सकते या फिर बनना चाहते हैं। इसीलिए यदि लक्ष्य को पाना है,उसे जीतना है तो संघर्ष और त्याग तो करना ही पड़ेगा क्योंकि हर सपने की कीमत होती है।
अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, जो सभी के भीतर होती हैं। ये श्री कृष्ण और मामा शकुनि की तरह हैं,जो हमारा गुरु बनकर हमें राह दिखाती है।अब यह हम पर निर्भर है कि हम क्या चुनते हैं? अर्जुन बनना या फिर दुर्योधन।
गुरु का हमारे जीवन में विशेष स्थान है, चाहे वह कोई भी हो। कोई महात्मा या कोई आम इन्सान जिससे भी हम कुछ अच्छा सीख सकें। किन्तु ध्यान रहे गुरु का चुनाव भी बहुत सोच समझकर करना चाहिए। किसी अल्पज्ञानी अथवा दुरबुद्धि व्यक्ति का चयन गुरु के रूप में करने से भयंकर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अतः सोच समझकर दूरदर्शिता के साथ चुनाव करें।
गगन-धरा को एक करे जो, मरू;सागर से भर लाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं । शब्दों को लय में जो गूंथे, भावों का जो सार भरे। जीवन को प्रकृति से जोड़े, मानव मन की सृष्टि करे। शोक के सागर में डूबे की, तत्क्षण हरती विपदायें। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं। राजसभा या रंगमंच, या युद्धक्षेत्र की रणभेरी। परमप्रभु का भक्तिनाद, या निर्धन जन की हो डेरी। प्रतिक्षण-प्रतिपल स्थिति विशेष में, भिन्न भिन्न यह रूप धरे। मानव मन में शौर्य,प्रेम और भक्ति का संचार करे। रण का भीषण दृश्य दिखाए, हरि दर्शन भी करवाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं । कई रसों से व्याप्त काव्य, यह शिव ताण्डव कहलाता है। कभी वीर रस में डूबा, महाराणा प्रताप बन जाता है। भक्ति रस से सराबोर हो, ये तुलसी-मीरा-सूर बने। कभी कृष्ण के प्रेम में डूबा, राधा का यह रूप धरे। कभी धरे श्रृंगार रूप तो, सिया-राम बन जाता है। कभी कथाओं का माध्यम ले, रामायण भी कहलाता है। पग-पग,नव-नव वेष ये धारे, जन जीवन को सिखलाए। निर्जन में भी प्राण फूंक दे, ऐसी कवि की रचनाएं। हैं ऐसी कवि की रचनाएं ।
कविताओं और कहानियों का हमारे जीवन में सदैव से ही विशेष स्थान रहा है। चाहे वो बचपन में दादा-दादी से सुनी हुई कहानियां हों या किताबों में छपी हुई कविताएं। ये कवियों और लेखकों की रचनाएं ही तो हैं, जो हमारे मन को कल्पनाओं और भावनाओं से भर देती हैं। इन्हें पढ़ते ही हमारा मन कल्पनाओं से सागर में गोते लगाना शुरू कर देता है। ये कल्पनाओं के साथ साथ जीवन की वास्तविकताओं से तो हमारा परिचय कराती ही हैं।साथ ही साथ हमारे भीतर प्रेम, उत्साह,साहस,भक्ति आदि भावनाओं को जगाते हुए हमारा मार्गदर्शन भी करती हैं।
हर बात बेबाक हो;कह देना यूं तो अच्छा है लेकिन, कुछ राज़ अगर दिल में दफ्न रहें तो ही अच्छा ।
दिल की कुछ बातें सभी को बताई नहीं जा सकती। अपनों को भी नहीं। क्योंकि कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनको आप के सिवा कोई भी नहीं समझ सकता है। ये बात इसलिए भी ज़रूरी है,क्योंकि ज़िंदगी के कुछ किस्से ऐसे भी होते हैं;जो सिर्फ बस आपसे जुड़े होते हैं और जो बात दुसरे से जुड़ी न हो, तो लोग उसे या तो टाल देते हैं या एक कान से सुन दुसरे से निकाल देते हैं ।
शक्ल-ओ-सूरत की मोहताज है सारी दुनियां, कोई अच्छा हो या बुरा कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।
आज दुनिया दिखावे के पीछे पागल है। आजकल सुंदरता के आगे व्यक्तित्व और विचारों का कोई मूल्य नहीं है, जबकि ये बाहरी दिखावे पल भर के होते हैं। खूबसूरती का पहनावे से कोई लेना देना नहीं है। ज़रूरी नहीं जो देखने में अच्छा हो लगे वो वास्तव में वैसा ही हो। दिखावे के पीछे भागने वालों को ज़्यादातर कड़वे अनुभवों को झेलना पड़ता है। इसलिए सुन्दरता पर नहीं अच्छे स्वभाव और सरलता से प्रेम करो।
माला बनने के लिए फूलों को एक साथ जुड़ना ज़रूरी होता है।अगर फूल अकेला हो तो भगवान उसे केवल अपने चरणों में ही स्थान देते हैं। जबकि वो उस माला को गले से लगाते हैं,जो फूलों की एकता और प्रेम का प्रतीक है,किसी अकेले फूल के अहंकार का नहीं।ठीक उसी प्रकार यदि हम सभी भारतीय ये चाहते हैं,कि विश्व हमें सम्मान की दृष्टि से देखे ;तो हमें मिलकर एक होना होगा। क्योंकि लड़ाई अगर घर में हो तो फ़ायदा हमेशा कोई तीसरा ही उठा ले जाता है। इसलिए सभी वाद और मतभेदों को भुलाकर हमें एक नई शुरुआत करनी होगी।