यहां हूं दर बदर भटका मैं तेरी चाह में लेकिन, न तेरा अक्स ही देखा न तेरी आहटें पाईं। भटकता चाह में तेरी कहीं तो पा सकूं तुझको, मगर मैं ही नहीं हर शख्स तुझको ढूंढता होगा।
Here I have wandered from place to place in search of you, but neither have I seen your reflection nor found your voice. I wander longing for you, I wish I could find you somewhere, but not only I, but every person must be searching for you.
हम दुनिया की चकाचौंध में खोए रहते हैं और बाहर खुशियों की तलाश करते हैं जिससे हमें सुकून मिल सके; शांति मिल सके। लेकिन हम जब भी खुद को दूर से देखते हैं , तो खुद को अकेला पाते हैं। सच कहें तो असली सुकून बाहर नहीं खुद के दिल के भीतर होना चाहिए। लेकिन इसी सुकून की तलाश में हम ज़िंदगी भर बाहर भटकते रहते हैं।
We remain lost in the glamor of the world and look for happiness outside which can give us peace. But whenever we look at ourselves from a distance, we find ourselves alone. To be honest, real peace should not be outside but within one’s own heart. But in search of this peace we keep wandering outside throughout our lives.
कुछ करने के बदले स्वयं को कुछ मिलने या पाने की संभावना का भाव ही आशा है।तो फ़िर निराशा क्या है?उत्तर है आशा का टूट जाना या अपने मानदंडों पर खरा न उतरना।
जब भी हम किसी के लिए या अपने लिए कुछ करते हैं तो उससे एक आशा जुड़ जाती है कि अंत में हमें ये मिलेगा या फिर हमारे साथ ऐसा होगा परन्तु यदि हमें हमारी सोच के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं तो फ़िर वहां से हमारे अंतरमन में निराशा का जन्म होता है। जो हमारे दुखों का मूल कारण है।
जब भी हम निराश होते हैं तो हमें मानसिक कष्ट की अनुभूति होती है और यही मानसिक कष्ट ही दुःख कहलाता है। ये दुःख हमें अन्दर तक तोड़ देता है और हमारा सुख-चैन सब कुछ छीन लेता है। तब हमारा जीवन अन्धकार से घिर जाता है। तो क्या तरीका है इस दुःख से बाहर निकलने का; इससे पार पाने का।
दुःख से मुक्ति…..?यह एक अत्यन्त जटिल प्रश्न है, जिसका हल ढूंढने का प्रयास युगों-युगों से चलता आ रहा है। कई ऋषियों,महात्माओं, ज्ञानियों,साधुओं और संतों ने इस गूढ़ तथ्य का हल ढूंढने में अपना जीवन लगा दिया। फिर एक उत्तर मिला-“जो दुःख का मूल कारण है उससे दूर रहो”। आज इस उत्तर का अर्थ सभी के लिए अलग अलग है। हमने अपनी सोच-समझ के अनुरूप इसका भिन्न भिन्न अर्थ लगा लिया है।
आज अपने दुखों से सभी मुक्ति चाहते हैं परन्तु इसके कारण पर कोई विचार नहीं करता। किसी के लिए पैसे की कमी दुःख का कारण है तो किसी के लिए अपनों का साथ न देना। किसी को ईश्वर प्राप्ति में दुःख से मुक्ति दिखाई देती है तो किसी को सांसारिक भोग-विलास में। कोई असफल होने पर दुःख है तो कोई इच्छा की पूर्ति न होने से। इसके लिए किसी ने घर छोड़ा,तो किसी ने परिवार,किसी ने सन्यास लिया, तो किसी ने धन प्राप्ति में ख़ुद को झोंक दिया। परन्तु किसी को भी उसके दुख से मुक्ति नहीं मिली।
तो क्या है दुखों से मुक्ति का रहस्य जो हमारे समझ से परे है। आपको ज्ञात होगा कि जब आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे तो आपके मन में इससे बचने का क्या उपाय सूझा जो था धन कमाना। अब आपने सोचा कि इससे आपका दुख कम होगा। पर इससे बस आपकी समस्याएं कम हुईं,आपका दुख नहीं।अब आपकी आवश्यकता और इच्छा बढ़ी और आप फिर आशा करते हैं कि और अधिक धन आपकी समस्या को सुलझा देगा।लेकिन फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।अब जो अपने आशा की वो निराशा में और आपकी निराशा दुःख में बदल गई। और आप फिर वहीं हैं जहां से आपने शुरू किया था।
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में दुखों से मुक्ति का मार्ग बताया है,उन्होने कहा है कि “कर्म करो,फल की चिंता मत करो”। अर्थात् अपना कर्त्तव्य तो करते जाओ परन्तु उसके पश्चात् मिलने वाले परिणाम की चिंता भूल जाओ। इसका एक अलग अर्थ यह भी है कि अपने कर्मों के बदले कुछ मिलने की आशा त्याग दो। यदि इसे ही छोड़ दिया तो इसके टूटने पर होने वाली निराशा और दुख नहीं होगा।
इसलिए यदि हम अपने या किसी के लिए कुछ कर रहे हों तो हमे उसके बाद जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए। जैसे आपने बुरे समय किसी का साथ दिया तो यह आशा न करें कि वो भी आपके बुरे समय में आपका साथ देगा। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप हताश और निराश होंगे जो आपको दुख पहुंचाएगा। इस प्रश्न का यही उत्तर है कि किसी व्यक्ति या वस्तु के लिए कर्म करो मगर उम्मीद नहीं क्योंकि अगर ये टूटी तो आप भी टूट जाओगे। इसके स्थान पर अपने मन में संतोष और धीरज को धारण कर आप मानसिक दुख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि यह करना अत्यन्त कठिन है पर असंभव नहीं।
वक्त तो लगता है तराशने में खुद को, कामयाबी की चमक चेहरे पर यूं ही नहीं आती।
It takes time to hone yourself, the glow of success does not appear on your face just like that.
अक्सर हमारी सोच यही होती है कि हम जल्दी से कामयाब हो जाए;सफल हो जाए। लेकिन सफलता वक्त लेती है यूं नहीं मिलती। उसके लिए दिन-रात लगन के साथ मेहनत करनी पड़ती है। जैसे ईंट का मकान भी कभी एक दिन में नहीं बनता उसके लिए लम्बी योजना बनानी पड़ती है।सबसे पहले हम ज़मीन खरीदते हैं और फिर नींव डाली जाती है। जब नींव पकती है और तब कहीं जाकर मकान बनना शुरू होता है और मकान भी रहने लायक यूं हीं नहीं बन जाता। उसके लिए महीनों का वक्त लगता है। ठीक उसी तरह सफल होने के लिए भी योजना और उस पर अमल किया जाना ज़रूरी है। यूं हांथ पर हाथ धरे रहने के बाद ये उम्मीद करना बेवकूफी है कि हम एक दिन उठेंगे और झण्डे गाड़ देंगे। इसीलिए ख़ुद और खुद के प्रयासों को वक्त दीजिए क्योंकि चमत्कार सभी के साथ नहीं होते।
Often our thinking is that we should achieve success quickly. But success takes time and is not achieved just like that. For that one has to work diligently day and night. Just like a brick house is never built in a day, a long plan has to be made for it. First of all we buy land and then the foundation is laid. When the foundation is ready and then the construction of a house starts and the house also does not become habitable just like that. It takes months for that. Similarly, to be successful, it is important to plan and implement it. After sitting idle like this, it is foolish to expect that one day we will wake up and achieve success. Therefore, give time to yourself and your efforts because miracles do not happen to everyone.
अकेलेपन का गम उससे ज्यादा और कोई नहीं समझ सकता, जो अपनों के साथ रहने के बावजूद अकेला महसूस करता हो।
बहुत तकलीफ़ होती है जब अपने साथ होते हुए भी बहुत दूर होते हैं।एक अलग सा दर्द महसूस होता है । ऐसा नहीं कि अपने साथ नहीं देते, मगर कोई आपको समझने वाला नहीं होता। ऐसे में तकलीफ़ दुगनी हो जाती है और इस हाल में हम अक्सर गलत फैसले कर बैठते हैं या कोई गलत आदत अपना लेते हैं,अपनी मायूसी को छुपाने के लिए। लेकिन हमारी दिक्कतें कम नहीं होती, बल्कि और भी ज्यादा बढ़ने लगती हैं । इसलिए अगर आप अकेला महसूस करते हैं तो अपनों से इस बारे में बात कीजिए,अपने दोस्तों से मिलिए और खुद को खुश रहने की कोशिश कीजिए। तभी आप अकेलेपन के भॅवर से निकल सकते हैं वरना डूब जायेंगे।
अगर जेब में भारीपन और कपड़ो में महंगाई की झलक हो, तो दुनियां कभी ये नहीं पूछती कि ये दौलत कहां से आयी ?
इस दुनिया में पैसे की कीमत इन्सान से ज़्यादा हो गई है।इसके आगे प्यार, मुहब्बत, रिश्ते,नाते सब बे मायने होते जा रहे हैं।आज कल सफ़लता की निशानी बस पैसा हो गया है। बात कड़वी है; मगर सच है कि आजकल लोगों की ज़रूरतें और मानसिकता पैसे से इतनी ज़्यादा जुड़ चुकी है,कि आज मर रहे इंसान की ज़िंदगी के अलावा पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। पैसे और सम्पत्ति के लिए भाई-भाई और दोस्त-दोस्त का दुश्मन बन बैठा है। अगर आप अमीर हैं, आपके पास बेहिसाब पैसा है तो आपसे कोई ये नहीं पूछेगा कि आपके पास इतना सारा पैसा कहां से आया । भले ही वो पैसे आपने किसी गलत रास्ते को अपनाकर ही क्यों न कमाया हो।
लड़ता रहा, घिसता रहा,संघर्ष में पिसता रहा। कभी मौसमों की मार से,सभी छेनियों के वार से। कितनी ही चोटे खाई हैं,तब जाकर वो सूरत पाई है। जिसको ये जग है पूजता, हर ओर जिसको ढूंढता।
पत्थर को भी भगवान का दर्जा यूं ही नहीं मिल जाता, उसे पाने में पत्थर को कई तकलीफें उठानी पड़ती है। उसे मूर्तिकार द्वारा छेनी से तिल-तिल कर काटा जाता है, घिसा जाता है।तब जाकर कहीं वो भगवान का स्वरूप प्राप्त कर पाता है।ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी यदि बड़ा बनना, महान बनना हो तो उसे भी कर्म और संघर्ष की कसौटी पर घिसना पड़ेगा।तब जाकर कहीं वह वो स्थान प्राप्त कर पाएगा जो अन्य लोगों के लिए दुष्कर है।
अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, जो सभी के भीतर होती हैं। ये श्री कृष्ण और मामा शकुनि की तरह हैं,जो हमारा गुरु बनकर हमें राह दिखाती है।अब यह हम पर निर्भर है कि हम क्या चुनते हैं? अर्जुन बनना या फिर दुर्योधन।
गुरु का हमारे जीवन में विशेष स्थान है, चाहे वह कोई भी हो। कोई महात्मा या कोई आम इन्सान जिससे भी हम कुछ अच्छा सीख सकें। किन्तु ध्यान रहे गुरु का चुनाव भी बहुत सोच समझकर करना चाहिए। किसी अल्पज्ञानी अथवा दुरबुद्धि व्यक्ति का चयन गुरु के रूप में करने से भयंकर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अतः सोच समझकर दूरदर्शिता के साथ चुनाव करें।
हर बात बेबाक हो;कह देना यूं तो अच्छा है लेकिन, कुछ राज़ अगर दिल में दफ्न रहें तो ही अच्छा ।
दिल की कुछ बातें सभी को बताई नहीं जा सकती। अपनों को भी नहीं। क्योंकि कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनको आप के सिवा कोई भी नहीं समझ सकता है। ये बात इसलिए भी ज़रूरी है,क्योंकि ज़िंदगी के कुछ किस्से ऐसे भी होते हैं;जो सिर्फ बस आपसे जुड़े होते हैं और जो बात दुसरे से जुड़ी न हो, तो लोग उसे या तो टाल देते हैं या एक कान से सुन दुसरे से निकाल देते हैं ।
शक्ल-ओ-सूरत की मोहताज है सारी दुनियां, कोई अच्छा हो या बुरा कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।
आज दुनिया दिखावे के पीछे पागल है। आजकल सुंदरता के आगे व्यक्तित्व और विचारों का कोई मूल्य नहीं है, जबकि ये बाहरी दिखावे पल भर के होते हैं। खूबसूरती का पहनावे से कोई लेना देना नहीं है। ज़रूरी नहीं जो देखने में अच्छा हो लगे वो वास्तव में वैसा ही हो। दिखावे के पीछे भागने वालों को ज़्यादातर कड़वे अनुभवों को झेलना पड़ता है। इसलिए सुन्दरता पर नहीं अच्छे स्वभाव और सरलता से प्रेम करो।
माला बनने के लिए फूलों को एक साथ जुड़ना ज़रूरी होता है।अगर फूल अकेला हो तो भगवान उसे केवल अपने चरणों में ही स्थान देते हैं। जबकि वो उस माला को गले से लगाते हैं,जो फूलों की एकता और प्रेम का प्रतीक है,किसी अकेले फूल के अहंकार का नहीं।ठीक उसी प्रकार यदि हम सभी भारतीय ये चाहते हैं,कि विश्व हमें सम्मान की दृष्टि से देखे ;तो हमें मिलकर एक होना होगा। क्योंकि लड़ाई अगर घर में हो तो फ़ायदा हमेशा कोई तीसरा ही उठा ले जाता है। इसलिए सभी वाद और मतभेदों को भुलाकर हमें एक नई शुरुआत करनी होगी।