लोग बदल रहे हैं(People are change)

लोग कहते हैं कि इन्सान को वक्त के साथ साथ खुद को बदलना चाहिए।
पर मैने लोगों को अपनी ज़रूरत के साथ ही बदलते देखा है।

जब आपका बुरा समय शुरू होता है तो आपके अपने, आपके सम्बन्धी सभी आपसे किनारा करने लगते है । जो आपके अच्छे दिनों में आपके साथ थे वो आपसे मिलने से कतराते हैं कि कहीं मिलते ही आप;उनसे कोई मदद न मांग ले और अगर आप उनसे मदद मांग भी लेते हैं तो अक्सर बहाने बनाकर आपकी बात टाल दी जाती है। ऐसे लोगों से दूर रहने और अपना काम से काम रखने का प्रयास करें। आप सुखी रहेंगे।

भूख(Hunger)

अक्सर ये सोचता था बड़ी तकलीफ़ है मुझे, पर ये आंख खुल गई जो निगाहें उधर गई। सड़कों के किनारे पे कचरे में हाथ में से, कोई शख्स मुझको आज रोटी उठाता हुआ मिला।

I often thought that I was in a lot of trouble, but my eyes were opened today when my eyes went to the place where I saw someone picking up bread from the garbage heap on the roadside.

भूख बड़ी ज़ालिम होती है कभी ये नहीं देखती आपके पास उसे देने के लिए कुछ है या नहीं।बस लग जाती है। रोटी इन्सान की सबसे पहली ज़रूरत है बाकी चीजें तो इसके बाद ही आती हैं। पेट की आग बहुत तेज़ होती है । इसने कितनों के ही घर जला दिए है,कितनों को ही मार डाला है और कितनों को ही मजबूर कर रही है अनचाहा या गलत काम करने के लिए, खासकर छोटे बच्चों को।जिनके हाथ में किताबे और आंखों में सुनहरे सपने होने चाहिए थे,उनके हांथ में कचरे की बोरी और आंखो में भूख की तड़प है।कही कोई अपना बचपन छोड़कर कमाने निकल पड़ा है तो कहीं कोई चोरी करके अपना पेट पालने को मजबूर है। इस विषय को छोटे से अंश में पूर्ण रूप से वर्णित करना संभव नहीं है। इसलिए बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आप उनकी सहायता करे न करें को सक्षम हैं पर उनकी सहायता करने से न चूकें जो असक्षम हैं। यही मानवता है जो हमें पशुओं से भिन्न बनाती है।

Hunger is very cruel, it never checks whether you have anything to give it or not. It just needs to eat something. Bread is the first need of a human being, other things come only after it. The stomach fire is very strong. It has burnt down so many houses, killed so many people and is forcing so many to do unwanted or wrong things, especially small children. Those who should have had books in their hands and golden dreams in their eyes, There is a sack of garbage in his hand and the pain of hunger in his eyes. Some people have left their childhood and set out to earn money while others are forced to survive by stealing. It is not possible to describe this topic completely in a small excerpt. So all I would like to say is that even if you do not help those who are capable, do not miss helping those who are unable. It is humanity that makes us different from animals.

सुकून(Inner Peace)

यहां हूं दर बदर भटका मैं तेरी चाह में लेकिन, न तेरा अक्स ही देखा न तेरी आहटें पाईं। भटकता चाह में तेरी कहीं तो पा सकूं तुझको, मगर मैं ही नहीं हर शख्स तुझको ढूंढता होगा।

Here I have wandered from place to place in search of you, but neither have I seen your reflection nor found your voice. I wander longing for you, I wish I could find you somewhere, but not only I, but every person must be searching for you.

हम दुनिया की चकाचौंध में खोए रहते हैं और बाहर खुशियों की तलाश करते हैं जिससे हमें सुकून मिल सके; शांति मिल सके। लेकिन हम जब भी खुद को दूर से देखते हैं , तो खुद को अकेला पाते हैं। सच कहें तो असली सुकून बाहर नहीं खुद के दिल के भीतर होना चाहिए। लेकिन इसी सुकून की तलाश में हम ज़िंदगी भर बाहर भटकते रहते हैं।

We remain lost in the glamor of the world and look for happiness outside which can give us peace. But whenever we look at ourselves from a distance, we find ourselves alone. To be honest, real peace should not be outside but within one’s own heart. But in search of this peace we keep wandering outside throughout our lives.

आशा ही दुखों का मूल है(Hope is the root of suffering)

कुछ करने के बदले स्वयं को कुछ मिलने या पाने की संभावना का भाव ही आशा है।तो फ़िर निराशा क्या है?उत्तर है आशा का टूट जाना या अपने मानदंडों पर खरा न उतरना।

जब भी हम किसी के लिए या अपने लिए कुछ करते हैं तो उससे एक आशा जुड़ जाती है कि अंत में हमें ये मिलेगा या फिर हमारे साथ ऐसा होगा परन्तु यदि हमें हमारी सोच के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं तो फ़िर वहां से हमारे अंतरमन में निराशा का जन्म होता है। जो हमारे दुखों का मूल कारण है।

जब भी हम निराश होते हैं तो हमें मानसिक कष्ट की अनुभूति होती है और यही मानसिक कष्ट ही दुःख कहलाता है। ये दुःख हमें अन्दर तक तोड़ देता है और हमारा सुख-चैन सब कुछ छीन लेता है। तब हमारा जीवन अन्धकार से घिर जाता है। तो क्या तरीका है इस दुःख से बाहर निकलने का; इससे पार पाने का।

दुःख से मुक्ति…..?यह एक अत्यन्त जटिल प्रश्न है, जिसका हल ढूंढने का प्रयास युगों-युगों से चलता आ रहा है। कई ऋषियों,महात्माओं, ज्ञानियों,साधुओं और संतों ने इस गूढ़ तथ्य का हल ढूंढने में अपना जीवन लगा दिया। फिर एक उत्तर मिला-“जो दुःख का मूल कारण है उससे दूर रहो”। आज इस उत्तर का अर्थ सभी के लिए अलग अलग है। हमने अपनी सोच-समझ के अनुरूप इसका भिन्न भिन्न अर्थ लगा लिया है। 

 आज अपने दुखों से सभी मुक्ति चाहते हैं परन्तु इसके कारण पर कोई विचार नहीं करता। किसी के लिए पैसे की कमी दुःख का कारण है तो किसी के लिए अपनों का साथ न देना। किसी को ईश्वर प्राप्ति में दुःख से मुक्ति दिखाई देती है तो किसी को सांसारिक भोग-विलास में। कोई असफल होने पर दुःख है तो कोई इच्छा की पूर्ति न होने से। इसके लिए किसी ने घर छोड़ा,तो किसी ने परिवार,किसी ने सन्यास लिया, तो किसी ने धन प्राप्ति में ख़ुद को झोंक दिया। परन्तु किसी को भी उसके दुख से मुक्ति नहीं मिली।

तो क्या है दुखों से मुक्ति का रहस्य जो हमारे समझ से परे है। आपको ज्ञात होगा कि जब आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे तो आपके मन में इससे बचने का क्या उपाय सूझा जो था धन कमाना। अब आपने सोचा कि इससे आपका दुख कम होगा। पर इससे बस आपकी समस्याएं कम हुईं,आपका दुख नहीं।अब आपकी आवश्यकता और इच्छा बढ़ी और आप फिर आशा  करते हैं कि और अधिक धन आपकी समस्या को सुलझा देगा।लेकिन फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।अब जो अपने आशा की वो निराशा में और आपकी निराशा दुःख में बदल गई। और आप फिर वहीं हैं जहां से आपने शुरू किया था।

  भगवान श्री कृष्ण ने गीता में  दुखों से मुक्ति का मार्ग बताया है,उन्होने कहा है कि “कर्म करो,फल की चिंता मत करो”। अर्थात् अपना कर्त्तव्य तो करते जाओ परन्तु उसके पश्चात्  मिलने वाले परिणाम की चिंता भूल जाओ। इसका एक अलग अर्थ यह भी है कि अपने कर्मों के बदले कुछ मिलने की आशा त्याग दो। यदि इसे ही छोड़ दिया तो इसके टूटने पर होने वाली निराशा और दुख नहीं होगा।

      इसलिए यदि हम अपने या किसी के लिए कुछ कर रहे हों तो हमे उसके बाद जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए। जैसे आपने बुरे समय किसी का साथ दिया तो यह आशा न करें कि वो भी आपके बुरे समय में आपका साथ देगा। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप हताश और निराश होंगे जो आपको दुख पहुंचाएगा। इस प्रश्न का यही उत्तर है कि किसी व्यक्ति या वस्तु के लिए कर्म करो मगर उम्मीद नहीं क्योंकि अगर ये टूटी तो आप भी टूट जाओगे। इसके स्थान पर अपने मन में संतोष और धीरज को धारण कर आप मानसिक दुख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि यह करना अत्यन्त कठिन है पर असंभव नहीं।

जय(Victory)

जय एक दिवस की बात नहीं,
वर्षों का अथक परिश्रम है।
संकल्पों की ये गाथा है,
संघर्ष भरा इक जीवन है।
जय एक दिवस की बात नहीं,
वर्षो का अथक परिश्रम है…..।
हां विजय स्वप्न को लक्ष्य बना,
मानव जब जग से लड़ता है।
तब ही जयघोष स्वर्ण मुकुट,
योद्धा के सिर पर सजता है।
पर ये पथ भी आसान कहां,
जितना गाथाएं सुन लगता।
बाधाओं से टकराए बिन,
इस जग में कहां कुछ भी मिलता।
जय एक दिवस की बात नहीं,
वर्षो का अथक परिश्रम है।
संकल्पों की ये गाथा है,
संघर्ष भरा इक जीवन है।
जब भी कोई संकल्प करे,
अपने ही पथ भटकाते है।
कभी बहलाकर-कभी समझाकर,
कभी भय से रह भुलाते है।
गर साथ भी दे दें अपने तो,
औरों से लड़ना पड़ता है।
लोगों की पैनी बातों से,
पल-प्रतिपल बचना पड़ता है।
जो शंकाओं,उपहासों के,
काटों को मन में बोते हैं।
बच कर रहना उन लोगों से,
जो वास्तव में शत्रु होते हैं।
यदि पार हो चुकी हर विपदा,
तो दर्पण में खुद को देखो।
जो देख रहा है अब तुमको,
वो अब आखिर की बाधा है।
जय एक दिवस की बात नहीं,
वर्षो का अथक परिश्रम है।
संकल्पों की ये गाथा है,
संघर्ष भरा इक जीवन है।
अब बात है अन्त समस्या की,
खुद से ही खुद लड़ना होगा।
खुद के मन के बहकावे से,
हर पल तुमको बचना होगा।
सुख में तुमको भटकाएगा,
आलस की राह दिखायेगा।
ये कष्टों से डर बोलेगा,
अब तुमसे ना हो पाएगा।
इससे लड़ना आसान नहीं,
मन हर क्षण पथ भटकता है।
जिसने साधा अपने मन को,
निश्चित ही जय कर जाता है।
जय एक दिवस की बात नहीं,
वर्षो का अथक परिश्रम है।
संकल्पों की ये गाथा है,
संघर्ष भरा इक जीवन है।

Victory is not a matter of one day,it is years of tireless work.This is a story of resolutions, a life full of struggle. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work… Yes, victory becomes the goal of dreams when a person fights with the world. Only then does the golden crown of victory adorn the warrior’s head. But isn’t this path easy, no matter how many stories you hear? It seems. Where can anything be achieved in this world without hitting obstacles. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work. This is a saga of resolutions, a life full of struggle. Whenever someone makes a resolution, his own people start diverting him from the path. Sometimes by coaxing, sometimes by convincing, sometimes by scaring him, he is asked to forget his goal. Even if we support ourselves, we have to fight with others. We have to avoid sharp words from people at every moment. People who sow doubt in the mind, ridicule others, sow thorns in the mind. Stay away from those people who are actually my real enemies. If you have overcome every adversity, then look at yourself in the mirror. The one who is looking at you now is the last hurdle. Jai, it is not a matter of one day, it is years of tireless work. This is a story of resolutions, a life full of struggle. Now coming to the last problem, you will have to fight with yourself. From the illusion of one’s own mind. , you have to survive every moment. It will lead you astray in happiness, it will show you the path of laziness. It will make you afraid of pain, you will not be able to handle it anymore. It is not easy to fight this, the mind wanders every now and then. For a moment the person forgets his path. He who corrects his mind definitely wins. Victory is not a matter of one day, it is years of tireless hard work. This is a story of resolutions and struggle. It is a complete life.

कामयाबी(Success)

वक्त तो लगता है तराशने में खुद को, कामयाबी की चमक चेहरे पर यूं ही नहीं आती।

It takes time to hone yourself, the glow of success does not appear on your face just like that.

अक्सर हमारी सोच यही होती है कि हम जल्दी से कामयाब हो जाए;सफल हो जाए। लेकिन सफलता वक्त लेती है यूं नहीं मिलती। उसके लिए दिन-रात लगन के साथ मेहनत करनी पड़ती है। जैसे ईंट का मकान भी कभी एक दिन में नहीं बनता उसके लिए लम्बी योजना बनानी पड़ती है।सबसे पहले हम ज़मीन खरीदते हैं और फिर नींव डाली जाती है। जब नींव पकती है और तब कहीं जाकर मकान बनना शुरू होता है और मकान भी रहने लायक यूं हीं नहीं बन जाता। उसके लिए महीनों का वक्त लगता है। ठीक उसी तरह सफल होने के लिए भी योजना और उस पर अमल किया जाना ज़रूरी है। यूं हांथ पर हाथ धरे रहने के बाद ये उम्मीद करना बेवकूफी है कि हम एक दिन उठेंगे और झण्डे गाड़ देंगे। इसीलिए ख़ुद और खुद के प्रयासों को वक्त दीजिए क्योंकि चमत्कार सभी के साथ नहीं होते।

Often our thinking is that we should achieve success quickly. But success takes time and is not achieved just like that. For that one has to work diligently day and night. Just like a brick house is never built in a day, a long plan has to be made for it. First of all we buy land and then the foundation is laid. When the foundation is ready and then the construction of a house starts and the house also does not become habitable just like that. It takes months for that. Similarly, to be successful, it is important to plan and implement it. After sitting idle like this, it is foolish to expect that one day we will wake up and achieve success. Therefore, give time to yourself and your efforts because miracles do not happen to everyone.

प्रकृति हमें सिखाती है(Nature teaches us)

प्रकृति अर्थात् मां;जो जन्म देती है,सृजन है या यूं कहें कि हमें पालती है,हमारा भरण पोषण करती है।जैसे मां अपने बच्चे को 9 महीने अपने गर्भ में धारण करती है और उसका ख्याल रखती है,वैसे ही प्रकृति भी हमें चारों ओर से घेरे हुए ;अपने भीतर धारण किए हुए है। पर मां सिर्फ़ अपने बच्चे का ख्याल ही नहीं रखती बल्कि उसे शिक्षित भी करती है उसे सही और गलत का पाठ भी पढ़ाती है।ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी हमें सिखाने का प्रयास करती है।प्रकृति ज्ञान का भण्डार है,इसमें अनेकों सजीव और निर्जीव वास करते हैं। किन्तु हमें सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जिनमें सबसे पहली और बड़ी सीख है निस्वार्थ सेवा भावना। सूर्य,चन्द्रमा,धरती, आकाश, हवा, नदियां,पहाड़,पेड़-पौधे आदि सभी निस्वार्थ सेवा भाव रखते हैं। इन्होंने आज तक हमसे अपने लिए कुछ भी नहीं मांगा बल्कि हमें सदैव केवल दिया ही है।पेड़ों ने अपने फल नहीं खाएं,नदियों ने अपना पानी नहीं पिया,सूर्य और चंद्रमा अपना प्रकाश स्वयं नहीं लेते। इन्होंने अपने लिए कभी भी कुछ भी नहीं रखा। अब यहीं से दान और परोपकार की भावना का जन्म होता है।इसी प्रकार धरती से हमें धैर्य और सहनशक्ति तथा आकाश से विशाल हृदय बनने की सीख मिलती है। पहाड़ों से दृढ़ निश्चय और लक्ष्य से विचलित न होने तथा नदियों से हमें समानता की शिक्षा मिलती है।सूर्य हमें नियमितता और निरंतरता की शिक्षा तो देता ही है साथ ही साथ हमें दूसरों को सही राह दिखाना भी सिखाता है। चन्द्रमा से हमें बुरे समय व निराशा में मन को शान्त रखने और चींटी से अथक परिश्रम की शिक्षा मिलती है। ऐसे ही प्रकृति में हर किसी से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। ज़रूरत है बस उसे समझने की,उसे महसूस करने की। इसलिए प्रकृति को समझने और उससे जुड़ने का प्रयास करें उसे मिटाने का नहीं।

Nature means mother; who gives birth, creates or can say that nurtures us. Just like a mother carries her child in her womb for 9 months and takes care of him, similarly nature also surrounds us. Surrounded from all sides and holding it within itself. But the mother not only takes care of her child but also educates him, teaches him the lesson of right and wrong. In the same way, nature also tries to teach us. Nature is a storehouse of knowledge, there are many living and non-living things in it. We do. But we get to learn something from everyone. The first and biggest lesson in which is the spirit of selfless service. Sun, moon, earth, sky, air, rivers, mountains, trees and plants etc. all have selfless service. He has not asked us for anything till today, but has always given us only. Trees do not eat their fruits, rivers do not drink their water, sun and moon do not take their own light. He never kept anything for himself. Now it is from here that the spirit of charity and charity is born. Similarly, we learn patience and tolerance from the earth and a big heart from the sky. From the mountains we learn determination and not to be distracted from the goal and from the rivers we learn commonality. Sun not only teaches us regularity and continuity but also teaches us to show the right path to others. From the moon, we learn to keep our mind calm in bad times and despair, and from the ant we learn to work tirelessly. Similarly in nature one gets to learn something or the other from everyone. You just need to understand it, feel it. That’s why try to understand nature and connect with it, not to destroy it.

यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता(Nothing is wasted here)

कैसे छोटा सा बीज कोई,
एक वृहत वृक्ष बन जाता है।
कैसे माटी का इक ढेला,
जल में हिल्लोल(तरंग)बनाता है।
जग में प्रभु की जो भी रचना,
उसका अब मोल हु समझाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
नन्ही सी चींटी को देखो,
कैसे जी जान लगाती है।
कैसे छोटी की नाव कोई,
तूफानों से टकराती है।
दृढ़ हो निश्चय संकल्प-अटल,
सब कुछ संभव है हो जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
कैसे वेगित हो जल धारा,
पाषाण चीर बढ़ जाती है।
देखो कैसे जल की बूंदे,
मिलकर सागर बन जाती है।
जलते दीपक से तुम सीखो,
अंधेरे से है लड़ जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
हां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
निर्जीव-सजीव जो हैं जग में,
सबकी अपनी-अपनी प्रभुता।
स्वयंमेव से तुच्छ बनो न कभी,
प्रभु ने सौंपी अदभुत क्षमता।
जैसे छोटे से पग धरके,
कोई पथ लंघन कर जाता।
प्रभु ने जग में जो कुछ भेजा,
है कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

How a small seed becomes a big tree.
How a earthen lump creates waves in water.
Whatever creation of God in the world,
now I have its value explains.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste here.
Look at the little ant how it tries its best.
How a small boat collides with the storms. .
Be strong in your determination steadfast,
If your determination is strong, then everything is possible.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste here.
How does a stream of water move faster, cutting through even the stones?.
See how the drops of water,
come together to become the ocean.
You learn from the burning lamp,
It fights the darkness.
Nothing goes waste here.
Yes, nothing goes waste.
The inanimate and living things in the world,
Everyone has their own sovereignty.
Never become insignificant on your own accord,
The Lord has given you amazing ability.
Just like taking a small step,
A path Would have skipped.
Whatever God has sent into the world,
nothing goes waste.
Yes nothing goes waste here.

” किसी को भी ख़ुद के कम आंकते हुए उसे उसका उपहास या अपमान करने की भूल ना करें,हो सकता उसमें वह गुण हो जो आपकी क्षमता है परे है। क्योंकि ईश्वर की हर रचना स्वयं में अद्वितीय है।”

“Don’t make the mistake of underestimating or insulting someone; they may have qualities that are beyond your ability. Because every creation of God is unique in itself.”

अकेला(Alone)

अकेलेपन का गम उससे ज्यादा और कोई नहीं समझ सकता, जो अपनों के साथ रहने के बावजूद अकेला महसूस करता हो।

बहुत तकलीफ़ होती है जब अपने साथ होते हुए भी बहुत दूर होते हैं।एक अलग सा दर्द महसूस होता है । ऐसा नहीं कि अपने साथ नहीं देते, मगर कोई आपको समझने वाला नहीं होता। ऐसे में तकलीफ़ दुगनी हो जाती है और इस हाल में हम अक्सर गलत फैसले कर बैठते हैं या कोई गलत आदत अपना लेते हैं,अपनी मायूसी को छुपाने के लिए। लेकिन हमारी दिक्कतें कम नहीं होती, बल्कि और भी ज्यादा बढ़ने लगती हैं । इसलिए अगर आप अकेला महसूस करते हैं तो अपनों से इस बारे में बात कीजिए,अपने दोस्तों से मिलिए और खुद को खुश रहने की कोशिश कीजिए। तभी आप अकेलेपन के भॅवर से निकल सकते हैं वरना डूब जायेंगे।

मुख हैं कुछ तो बोलेंगे(There are mouths, they will say something)

जिसके उर जैसी सोच बसी,
अंतर के पट ही खोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
मत सोच तेरी असफलता पर,
ये लोग व्यंग कर जाते हैं।
शायद तुझको है पता नहीं,
ये कोशिश से डर जाते हैं।
अरे जिसने न कभी कुछ की ठानी,
क्या सफल भला हो पायेंगे?
जिनको दूजा कोई कर्म नहीं,
बस अपना राग बजाएंगे।
जीतने भी हैं खाली बर्तन-2
नीचे गिरते ही बोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
माना कि है तलवार नहीं पर,
कम भी इसका वार नहीं।
मन-हृदय चीर बढ़ जाता है,
विष बुझे बाण बरसाता है।
कभी पुष्पों की वर्षा करता,
कभी मन में फांस चुभाता है।
कटु शब्द है रोक सका कोई-2
मन में जो विष ही घोलेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेंगे।
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।
शायद तुमने देखा होगा,
कुछ धूप-छांव के रंगो को
पल-पल जो वेश बदलते हैं,
धरते-तजते हैं संगों को।
कभी काग न गाए कोयल सा,
विषधर न अमृत दान करे।
जो बीज धरा में हो अरोपित,
वैसी ही उपज खलिहान करे।
ये अटल सत्य जाने फिर भी-2
जड़बुद्धि कहां चुप हो लेंगे।
मीठी-कड़वी सी कुछ बातें,
सुननी होंगी जब डोलेँगे
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे,
मुख ही हैं कुछ तो बोलेंगे।

“अक्सर लोग किसी न किसी बहाने से औरों को नीचा दिखाने या हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं और अपनी भीतर झाँकते तक नहीं। इसलिए ऐसे लोगों की बातों को नज़रंदाज़ करते हुए अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते रहें। क्योंकि जो आज कह रहे हैं कि तुमसे ना हो पाएगा कल वही तुम्हारी सफलता के गीत गायेंगे और कहेंगे मुझे पता था एक न एक दिन ये ज़रूर कुछ बड़ा करेगा।”