जो दोगे वही पाओगे

दूजों के दिखलाए पथ को,

बोलो किसने दोहराया?

राह पड़े दुःख के मारे को,

बोलो किसने अपनाया?

मन से काम किए ना कुछ भी,

आस है फल के बागों की।

बोलो ऐसे पथ पर चलकर,

किस मंज़िल तक जाओगे?

माटी में जो बीज है धारा,

अन्त वही तो पाओगे।

हां अन्त वही तो पाओगे।

सबने अपनी राह है धारी,

सबके अपने अपने पथ।

बाहर से सब एक साथ पर,

भीतर अपने अपने मत।

मन-मुख से हो विष की वर्षा,

रखते मांग हो अमृत की।

आने वाली पीढ़ी को तुम,

बोलो क्या सिखलाओगे?

माटी में जो बीज है धारा,

अन्त वही तो पाओगे।

हां अन्त वही तो पाओगे।

अपनों से अपनत्व नहीं पर,

अपना-अपना करते हो।

अपनों पर उपकार किया है,

नित-प्रतिदिन ही भजते हो।

अपनों पर उपकार है कैसा?

गर दिल से अपना माना।

संबंधों को तो त्याग दिया ,

पर मानवता भी ना जाना।

सबके सम्मुख अभिनय करते,

उर में धार रखा है छल।

बोलो हरि के धाम में जाके,

कैसे मुख दिखलाओगे?

माटी में जो बीज है धारा,

अन्त वही तो पाओगे।

हां अन्त वही तो पाओगे।

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