सपनों की कीमत(The Price of dreams)

किसी भी लक्ष्य को पाना यूं ही आसान नहीं होता।आज हम जितने भी सफल लोगों को देखते, सुनते या पढ़ते हैं,वे सभी यूं हीं सफल नहीं हुए। उनका भी अपना संघर्ष पूर्ण इतिहास रहा है;कुछ अनकहे किस्से रहे हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने की;इसे जीतने की जो उनकी यात्रा रही है, उसके दौरान उन्होने क्या कुछ सहा है; क्या कुछ झेला है ये बस उन्हीं को पता है। जिन्होंने अपने लक्ष्य प्राप्ति में संघर्ष करते हुए वर्षों लगा दिए।

ज़रा सोचिए जब भी हम औरों से कुछ अलग करते हैं या कोई बड़ा लक्ष्य बनाते हैं तो अक्सर परिवार और समाज हमें हतोत्साहित करने; रोकने का प्रयास करता है और जब भी हम उनकी बातों को अनसुना कर अपने लक्ष्य के लिए प्रयास प्रारम्भ करते हैं तो हमारा सामना अपने भीतर की दुर्बलताओं से होता है।चूंकि बड़े लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समय लगता है और बड़ा त्याग भी करना पड़ता है।

इसलिए कई बार हमारी हिम्मत जवाब दे जाती है और मन कहता है कि अब बस तुझे रुक जाना चाहिए, ये प्रयास छोड़ देना चाहिए। ये बात तेरे बस की नहीं है। यही वो निर्णायक क्षण है जो यह निर्धारित करता है कि हम क्या बनेंगे ? साधारण या असाधरण। यदि हम अपनी तकलीफों को नज़र-अंदाज़ करते हुए अपनी पूरी शक्ति अपने लक्ष्य प्राप्ति में झोंक देते हैं तो हमारी गणना असाधारण व्यक्तित्व की श्रेणी में होगी अन्यथा कहीं भी नहीं, क्योंकि साधारण व्यक्तिव की पूछ कहीं भी नहीं होती।

अक्सर लोग केवल उन्हीं को याद करते हैं जिनके जैसे वो बन नहीं सकते या फिर बनना चाहते हैं। इसीलिए यदि लक्ष्य को पाना है,उसे जीतना है तो संघर्ष और त्याग तो करना ही पड़ेगा क्योंकि हर सपने की कीमत होती है।

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