हौसला(Morale)

तूं कांटे बिछा,मैं दौड़ता जाऊं।
तूं दीवार खड़ी कर, मैं तोड़ता जाऊं।
तूं खाई खोद ,और मैं पुल बनाऊं।
तूं तूफान ले आ, मैं पहाड़ बन जाऊं।
तूं लाख कोशिशों के बावजूद मुझे हरा नहीं सकती।
क्योंकि अगर तूं मुसीबत है तो मैं भी हौसला हूं किसी का।

बुलन्द हौसलों के आगे,मुसीबतें धूल के सिवा कुछ नहीं। अगर मुसीबतें पहाड़ हैं तो, पहाड़ भी चकनाचूर होते हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि मुसीबतें बस हौसला आजमाती हैं।वास्तव में ये उतनी बड़ी नहीं होती जितना बड़ा हम उसे सोच-सोचकर बना देते हैं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं जो इन्सान के लिए असंभव हो। हमें बस नाकाम हो जाने का डर लगा रहता है इसलिए हम मुसीबतों का सामना करने से कतराते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि जो लड़ाई हमनें लड़ी ही नहीं उसमें हार जाने का कैसा डर ?

One thought on “हौसला(Morale)

Leave a comment