कोई तकलीफ़ में हो तो, इकट्ठी भीड़ होती है
मगर बेगाने जख्मों का, कोई मरहम नहीं बनता।
वो दिन कुछ और थे अश्कों को देखा, अश्क जा निकले।
पर अब किसी का दर्द;दूजे की दवा का काम करती है।
कोई तकलीफ़ में हो तो इकट्ठी भीड़ होती है
मगर बेगाने जख्मों का कोई मरहम नहीं बनता….।

हमारी ये आदत हो गई है की जब भी कोई तकलीफ़ में होता है तो हम तमाशा देखने चले जाते हैं। लेकिन कभी भी उसकी तकलीफ कम करने के बारे में सोचते तक नहीं। कभी-कभी तो हद ही हो जाती है, उदाहरण के लिए -अगर कोई सड़क पर मदद के लिए गिड़गिड़ा रहा हो या कोई अपंग जो ठीक से चल भी न पा रहा हो, को देखकर हंसने या उपहास करने लगते हैं। मदद तो दूर की बात है हम उससे सहानुभूति तक नहीं रखते। आजकल मानवता कहीं खोती जा रही है। हम चाहते तो हैं कि कोई हमारे बुरे समय में हमारी मदद करे लेकिन जब बारी हमारी होती है तो हम पीछे हट जाते हैं।

वाह, क्या बात है।
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Absolutely true we want help but maybe we don’t help.
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