दीपक(Lamp)

मैं दीपक जलना कर्म मेरा।
तम हर्ता हूं यह धर्म मेरा।
नित जलता मैं बुझ जाता हूं।
जीवन संदेश सुनाता हूं।
जैसे सूरज व प्रकृति सदा।
करते निश्चल हो कर्म सभी।
ले नेत्र खोल सुन हे मानव।
तज आशाएं है समय अभी।
जैसे सत्कर्मों की ख्याति।
तोड़े साड़ी सीमाओं को।
वैसे ही परहित दूर करे ।
साड़ी मानव विपदाओं को।
यहां जिसने भी जीता बांटा।
उससे ज्यादा वो पाएगा।
ये पूँजी सच्ची जीवन की।
जो ऊपर ले के जाएगा।
माना लोगो की सोच बुरी पर।
तू भी बुरा तो क्या अन्तर।
विश्वास तू कर दिन आएगा ।
जब जगेगा सबका अंतर।
दूजों से उम्मीद जो कर
तू परहित करता जाएगा।
तो सोच सदा ये कर्म तेरा
फिर लेने देंन कहलेगा।
विक्रेता नहीं तू मानव है।
मानवता बिन कैसा जीवन।
बन जा दीपक कर आलोकित।
धरती पर फैला ये उपवन।

दूसरों की मदद करने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी देखकर जो सुकून मिलता है उसे बयां नहीं किया जा सकता। अगर वैसा ही सुकून आपको भी महसूस करना हो तो किसी जरूरतमंद की मदद करके ज़रूर देखिएगा।”

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