महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने प्रियजनों और संबंधियों को अपने विरुद्ध खड़ा देख युद्ध से विमुख होकर अपना गाण्डीव रख देते हैं ।तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हुए कहते हैं –
शिथिल भुजायें,शीश झुका,चुपचाप खड़ा क्यों?
दृष्टि उठा,कर अवलोकन ये वही स्वजन हैं।
की पदधूलि तिलक;मस्तक पर जिनकी तूने,
आज उन्हीं को रण में तेरा आमंत्रण है।
देखी द्युत सभा में जिनकी थी प्रभुताई,
अग्निसुता का चीर छीनते लाज ना आई।
जिनके मोह को धार भुजाएँ कंपित तेरी,
देख सुनाते समरांगण में वो रण भेरी।
मूंक पड़े प्रतिमा सम जो थे शीश नवाए,
आज खड़े परकोटे बन हैं सम्मुख आए।
मनन करो उस कपट सभा की वो अनदेखी,
धर्म निबाह की आड़ में स्त्री की लाज ना रक्खी।
तात-गुरु-धर्मज्ञ थे अपना धर्म बचाए,
तब तूं भी तो मौन खड़ा था शीश झुकाये।
केश पकड़ जब खींच रहा था खल-उत्पाती,
चीख रही थी कुल मर्यादा बन बेचारी।
पर कैसे मैं चुप रहता रव-क्रंदन सुनकर,
आना पड़ा था मुझको फिर योगेश्वर बनकर।
अब देख रहा क्या चाप उठा प्रत्यंचा कस ले,
शर वर्षा कर आज समूचे नभ को ढक दे।
महाकाल बन जा ऐसे की काल भी कांपे,
कोई आंख उठा कर किसी स्त्री को ना ताके।
एक-एक के शीश गिरा दे रणभूमि में,
जैसे तिनके उड़ जाते मदमस्त पवन में।
यदि अब भी तूं मूक रहा तो यह भी सुन ले,
हर युग होंगे चीरहरण अब तो तू सुध ले…..।
यह सब सुन अर्जुन उठकर है धनुष उठाता,
फिर बाणों के बादल से अम्बर छा जाता।
नोट: ऊपर दी गई कविता में महाभारत युद्ध के श्री कृष्ण और अर्जुन के सारे प्रसंग को एक छोटी सी रचना में संजोना संभव नहीं था। इसलिए इसका एक अंश मात्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।


Well composed!
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Thank you very much 🙏
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Thank you very much
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बहुत सुंदर वर्णन।
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धन्यवाद 🙏🙏🙏
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