एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है?
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर; क्या मक्का है?
है रही बंटी चौराहे की,
पर मिलना सबको बस एक जगह।
न राम ने बोला मंदिर जा,
न खुदा कहे मस्जिद में रह।
जो बात लिखी कोरे मन पे,
जो पढ़ा-पढ़ाया-सीखा है।
जो छुपा कुरान-ए-शरीफ में है,
वो ही पैगम तो गीता है।
सब का बस एक सबक है जी,
जो चाहोगे देना होगा।
ये बात भी है तुम पर ठहरी,
तुम्हारे मन में क्या रखा है?
एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर;क्या मक्का है?
हो जाति धर्म का प्रश्न भले,
कब इसे किसका भला किया?
दिल को बस टुकड़ों में बांटा,
भाई-भाई से जुदा किया।
बच्चों से तुम लो सीख सदा,
क्या धर्म जाति का भान उन्हें?
जिसको पाया वो अपना है,
मेरा तेरा न ज्ञान उन्हे।
बच्चे प्रतिरूप है ईश्वर का,
ये सारा जग समझाता है।
जब इनको भेद नहीं आता,
तो तुम्हें कौन सिखता है?
उपरवाला न सिखलाये,
ये ऊंच-नीच-जाति-मज़हब।
ये उपज है तुच्छ विचारों की,
मुर्दे ना चुने श्मशान या कब्र।
हम सब धरती की संताने,
जो बस इंसान ही थे पहले।
जब मुस्लिम-हिंदू-सिख बने,
बस आप में टकराते हैं।
एक बात बताता हूं सुन लो,
क्या क्लेश-द्वेष में रखा है?
जब मन के भीतर प्रेम बसा,
फिर क्या मंदिर; क्या मक्का है?
“जैसे जल की एक बूंद कभी भी सागर नहीं बन सकती। वैसे ही राष्ट्र का विकास कोई भी जाति-धर्म या सम्प्रदाय स्वयं अपने बल पर नहीं कर सकता।उसके लिए सभी को एक साथ आना पड़ेगा।”
क्योंकि हांथ की पांचों उंगलियां मिलकर ही मुट्ठी बनाती है

और एक अकेली ऊंगली दुश्मनी और गुस्से को भड़काती है।”


Thank you so much
🙏🙏🙏🙏🙏
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