एक वक्त वो था सब अपने थे।
एक वक्त ये है बेगाने सब।
पहले थे सब पहचाने से।
अब लगते हैं अंजाने सब।
किस्मत की ऐसी मार पड़ी।
ना जी ही सके ना मर ही सके।
ज़िंदों जीतना न प्यार मिला।
मुर्दों जैसी इज्ज़त न मिली।
अपना भी घर अपना न रहा।
तकदीर ने की ये कैसी हँसी।
थे खेल निराले बचपन के।
थे साथ लड़े- थे साथ हंसे।
था अपना प्यार अनोखा भी।
पलभर रूठे पलभर में मने।
मां का आंचल-घर का आंगन।
वो खेल-खिलौने बचपन के।
घर का झूला यारों का संग।
थे पल वो सुहाने सपनों से।
पर यादों का क्या बस यादें हैं।
धुंधली जैसी परछाई सी।
लूं हाथ बढ़ा पर छू न सकूं।
लाखो में है तनहाई सी।

